अफगानिस्तान और पाकिस्तान की लंबी सीमा पर हाल के दिनों में तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। अक्टूबर 2025 में यहां भारी झड़पें हुईं जहां तालिबान लड़ाकों ने छोटे छोटे हमलों से पाकिस्तानी सेना को काफी नुकसान पहुंचाया। ये हमले गुरिल्ला युद्ध के तरीके से किए गए जो पहाड़ों और जंगलों में छिपकर अचानक होते हैं और फिर लड़ाके तेजी से गायब हो जाते हैं। नौ अक्टूबर को पाकिस्तान ने काबुल और अन्य जगहों पर हवाई हमले किए जिनमें टीटीपी के ठिकानों को निशाना बनाया गया। इसके जवाब में ग्यारह और बारह अक्टूबर को तालिबान ने सीमा पर कई पोस्ट पर कब्जा करने की कोशिश की। दोनों तरफ दर्जनों सैनिक मारे गए लेकिन तालिबान को इलाके की अच्छी जानकारी होने से बहुत फायदा मिला। बाद में कतर और तुर्की की मध्यस्थता से कुछ समय के लिए सीजफायर हो गया पर सीमा पर तनाव अभी भी बना हुआ है।
छापामार युद्ध यानी गुरिल्ला लड़ाई कैसे काम करती है
गुरिल्ला युद्ध वह तरीका है जिसमें छोटे समूह एक बड़ी और ताकतवर सेना पर अचानक हमला करते हैं। इस लड़ाई में लड़ाके जंगलों या पहाड़ों में छिपे रहते हैं और रात के अंधेरे में गोलियां चलाते हैं या छोटे बम फोड़ते हैं। हमला होने के बाद वे बहुत तेजी से भाग जाते हैं जिससे दुश्मन को उन्हें घेरना और पकड़ना मुश्किल हो जाता है। तालिबान ने अमेरिका के खिलाफ इसी तरह की लड़ाई लड़ी थी और जीत हासिल की थी। अब पाकिस्तान के खिलाफ भी यही रणनीति बहुत काम आ रही है क्योंकि अफ-पाक सीमा पर ऊबड़ खाबड़ जमीन है जहां बड़ी फौज आसानी से नहीं चल सकती। स्थानीय लोग इन लड़ाकों को खाना और छिपने की जगह देते हैं जो इनकी ताकत बहुत बढ़ाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इलाके की जानकारी गुरिल्ला लड़ाई में सत्तर प्रतिशत सफलता का सबसे बड़ा राज है।
हाल की घटनाओं ने दिखाया तालिबान का दम
नौ अक्टूबर को पाकिस्तान के हवाई हमलों के बाद तालिबान ने जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। उन्होंने कुर्रम कुनार और खोस्त जैसे इलाकों में पाकिस्तानी पोस्ट पर हमला बोल दिया। तालिबान का कहना है कि उन्होंने अट्ठावन पाक सैनिकों को मार गिराया और पच्चीस पोस्ट पर कब्जा किया। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने यह कहा कि उन्होंने उल्टा इक्कीस अफगान पोस्ट पर कब्जा कर लिया और दो सौ से ज्यादा लड़ाकों को खत्म कर दिया। बारह अक्टूबर को कुणार में तालिबान ने तीन पोस्ट अपने कब्जे में ले लीं और हेलमंड में बारह पाक सैनिक मारे गए। टीटीपी जो तालिबान का साथी संगठन है उसने पाकिस्तान के अंदर भी बम धमाके किए। खैबर पख्तूनख्वा में आठ अक्टूबर को एक काफिले पर हुए हमले में ग्यारह सैनिक शहीद हुए। इन सभी हमलों से साफ हो जाता है कि गुरिल्ला तरीका पाक सेना के लिए बहुत बड़ी समस्या बन गया है।
तालिबान को गुरिल्ला युद्ध में मिल रही ये खास ताकतें
पहाड़ी इलाके तालिबान की सबसे बड़ी पूंजी है जहां वे आसानी से छिप सकते हैं और अचानक हमला करके गायब हो जाते हैं। उनके पास भले ही आधुनिक हथियार कम हैं लेकिन रॉकेट और आईईडी की मदद से वे भारी नुकसान पहुंचा देते हैं। पश्तून लोग पाक सेना को बाहरी ताकत मानते हैं इसलिए तालिबान को उनका पूरा साथ मिलता है। अफगान तालिबान टीटीपी को ट्रेनिंग और हथियार देता है जिससे पाकिस्तान के अंदर हमले बहुत तेज हो गए हैं। पिछले चार सालों में टीटीपी ने छह सौ से ज्यादा हमले किए हैं। लंबी लड़ाई की आदत ने उन्हें थकान से लड़ने की ताकत दी है। ये सभी वजहें मिलकर गुरिल्ला युद्ध को तालिबान के लिए एक बहुत मजबूत हथियार बना देते हैं।
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