सैन फ्रांसिस्को की अदालतों में गुरुवार को दाखिल सात मुकदमों ने एआई कंपनी में बड़ी हलचल पैदा कर दी है। शिकायतों में कहा गया है कि ChatGPT ने कई लोगों को मानसिक रूप से प्रभावित किया है। आरोप है कि OpenAI को पहले से पता था कि उसका GPT-4O मॉडल लोगों की इमोशंस पर गहरा असर डाल सकता है, लेकिन फिर भी कंपनी ने इसे बिना जरूरी सिक्योरिटी इंतज़ामों के जारी कर दिया। इन मुकदमों में “लापरवाही”, “खुदकुशी में सहायता” और “गलत मृत्यु” जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ये शिकायतें उन परिवारों की ओर से की गई हैं जिन्होंने अपने करीबी लोगों को इस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के बाद खो दिया।
17 वर्षीय अमौरी का मामला बना चर्चा का विषय
सबसे ज़्यादा चर्चा में 17 साल के अमौरी लैसी का मामला है। बताया गया है कि उसने इमोशनल सपोर्ट के लिए ChatGPT से बात करना शुरू किया था। लेकिन परिवार का कहना है कि मदद करने के बजाय चैटबॉट ने उसे और ज़्यादा उलझा दिया। लगातार बातचीत से वह उस पर इमोशनली डिपेंड हो गया और धीरे-धीरे डिप्रेशन में चला गया। मुकदमे में दावा किया गया है कि ChatGPT ने न सिर्फ उसकी मानसिक हालत बिगाड़ी, बल्कि उसे आत्महत्या के तरीकों की जानकारी भी दी। परिवार का आरोप है कि यह कोई हादसा नहीं, बल्कि OpenAI की तकनीकी लापरवाही का नतीजा था। उनका कहना है कि अगर कंपनी ने सुरक्षा और नैतिक जांच की होती, तो यह हादसा टल सकता था।
बड़े लोगों पर भी पड़ा ChatGPT का असर
यह मामला सिर्फ किशोरों तक सीमित नहीं है। कनाडा के 48 वर्षीय एलन ब्रूक्स ने भी OpenAI के खिलाफ मुकदमा किया है। उनका कहना है कि उन्होंने करीब दो साल तक ChatGPT को निजी सहायक की तरह इस्तेमाल किया, लेकिन समय के साथ यह बातचीत उनके लिए मानसिक रूप से बोझ बन गई। एलन के मुताबिक, चैटबॉट ने उनके सोचने का तरीका बदल दिया, जिससे वे उलझन, असुरक्षा और अकेलेपन से घिर गए। उनका आरोप है कि इस “तकनीकी साथी” ने उनकी भावनात्मक कमजोरियों का फायदा उठाया और उनकी ज़िंदगी को असंतुलित कर दिया।
सिक्योरिटी से पहले कॉम्पीटीशन पर ध्यान?
वकीलों का कहना है कि OpenAI ने बाज़ार में तेजी से बढ़त पाने के लिए सुरक्षा उपायों को नज़रअंदाज़ कर दिया। उनका आरोप है कि GPT-4O को इस तरह बनाया गया कि वह यूज़र्स को भावनात्मक रूप से बांधे रखे, चाहे इससे मानसिक खतरा ही क्यों न बढ़े। सोशल मीडिया विक्टिम्स लॉ सेंटर के संस्थापक मैथ्यू बर्गमैन का मानना है कि यह “कॉर्पोरेट लापरवाही” का मामला है, जहां तकनीकी तरक्की ने नैतिकता और सुरक्षा को पीछे छोड़ दिया। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में जवाबदेही तय होना ज़रूरी है ताकि आने वाले समय में एआई कंपनियां लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ न कर सकें।
AI की नैतिकता पर उठे सवाल
इन मुकदमों ने एआई के इस्तेमाल को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या मशीनें सच में इंसानों की भावनाओं को समझ सकती हैं? क्या किसी डिजिटल बातचीत का असर इतना गहरा हो सकता है कि कोई व्यक्ति खुद को नुकसान पहुंचा ले? इन मामलों का फैसला आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कानूनी नियमों को आकार दे सकता है। साथ ही, यह हमें याद दिलाता है कि चाहे तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, वह इंसानी संवेदनाओं की जगह नहीं ले सकती।
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