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Anurag Kashyap Birthday: 53 साल के हुए अनुराग कश्यप, बॉक्स ऑफिस से लेकर ओटीटी तक उनकी यह फिल्में रही धाकड़

अनुराग कश्यप ने अपने संघर्षों और जुनून से बॉलीवुड में क्राइम और रियलिस्टिक ड्रामा को नई पहचान दी। सेंसर बोर्ड की लड़ाइयों, फ्लॉप फिल्मों और विवादों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपने अनोखे अंदाज़ से इंडियन सिनेमा को एक नई दिशा दी।

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अनुराग कश्यप का जन्म 10 सितंबर 1972 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उनकी स्कूली पढ़ाई ग्वालियर के सिंधिया स्कूल में हुई और फिर उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के हंसराज कॉलेज से आगे की पढ़ाई की। फिल्मों की दुनिया में आने से पहले उन्होंने काफी संघर्ष किया। मुंबई आने के बाद उन्होंने टीवी शोज़ के लिए स्क्रिप्ट लिखनी शुरू की और धीरे-धीरे फिल्मों में को-राइटर के तौर पर काम मिलने लगा। 1998 में राम गोपाल वर्मा की फिल्म सत्या के लिए सह-लेखन किया, जिससे उन्हें पहली बार इंडस्ट्री में असली पहचान मिली।

ब्लैक फ्राइडे (2004)

ब्लैक फ्राइडे 1993 के मुंबई बम धमाकों पर आधारित है और ये सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं है, ये उस पूरे सिस्टम की परतें खोलती है जिसमें राजनीति, धर्म और सामाजिक तनाव गहराई से जुड़े हुए हैं। अनुराग कश्यप ने इस फिल्म को बेहद सच्चाई और बेबाकी से बनाया। इस फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि नफरत और हिंसा का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ता है। फिल्म ने दर्शकों को झकझोरा और ये सोचने पर मजबूर किया कि आतंक का असली बोझ कौन उठाता है।

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देव डी (2009)

अनुराग कश्यप की देव डी ने प्रेम और रिश्तों पर समाज की पुरानी सोच को तोड़ते हुए नया नजरिया दिया। यह शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के क्लासिक उपन्यास देवदास का मॉडर्न रूप था, जिसमें शराब और आत्मदया की जगह आत्म-खोज और स्वतंत्रता को रखा गया। फिल्म ने शहरी युवाओं के रिश्तों, उनकी इच्छाओं और असुरक्षाओं को साहसिक तरीके से पेश किया।

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गुलाल (2009)

गुलाल राजनीति, सत्ता और जातिवाद पर गहरी चोट करने वाली फिल्म है। यह राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहाँ छात्र राजनीति के जरिए समाज में फैलती कट्टरता और जातीय विभाजन को उजागर किया गया है। फिल्म दिखाती है कि कैसे महत्वाकांक्षा और सत्ता की भूख इंसान को भ्रष्ट कर देती है। अनुराग कश्यप ने इस फिल्म के माध्यम से युवाओं को संदेश दिया कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं है, बल्कि यह समाज को दिशा देने का बड़ा जरिया भी हो सकता है।

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गैंग्स ऑफ वासेपुर (2012)

गैंग्स ऑफ वासेपुर भारतीय सिनेमा में क्राइम ड्रामा की परिभाषा बदल देने वाली फिल्म है। दो भागों में बनी इस फिल्म ने झारखंड के धनबाद क्षेत्र की माफिया राजनीति, खून-खराबा और पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे बदले की कहानी को बेहद वास्तविक ढंग से दिखाया। फिल्म ने यह स्पष्ट किया कि अपराध केवल व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं, बल्कि व्यवस्था और सत्ता से भी गहराई से जुड़ा है।

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अगली (2013)

अगली इंसानी रिश्तों, लालच और स्वार्थ की सच्चाई दिखाने वाली फिल्म है। कहानी एक बच्ची के अपहरण पर केंद्रित है, लेकिन फिल्म असल में यह बताती है कि कैसे इंसान अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है। पुलिस, मीडिया और परिवार सभी अपने-अपने हित साधने में लगे रहते हैं, जबकि बच्ची की जिंदगी पीछे छूट जाती है।

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मुक्काबाज़ (2018)

मुक्काबाज़ खेल, जातिवाद और व्यवस्था की खामियों पर आधारित फिल्म है। यह कहानी है एक बॉक्सर की, जिसे अपने सपनों के लिए केवल रिंग में नहीं, बल्कि समाज और सिस्टम से भी लड़ना पड़ता है। फिल्म ने दिखाया कि कैसे खेलों में प्रतिभा से ज्यादा राजनीति और जातिगत प्रभाव हावी होता है। जातिवाद और भ्रष्ट व्यवस्था ने कई खिलाड़ियों के करियर खत्म कर दिए, और यही मुद्दा अनुराग ने बखूबी उठाया।

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मनमर्ज़ियां (2018)

यह कहानी है आज के युवाओं की, जो प्यार और शादी को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। फिल्म ने यह दिखाया कि रिश्ते अब केवल पारिवारिक दबाव या सामाजिक बंधनों पर आधारित नहीं, बल्कि व्यक्तिगत भावनाओं और स्वतंत्रता पर भी टिके हैं। इसमें आधुनिक रिश्तों की जटिलताओं और कंफ्यूजन को ईमानदारी से दिखाया गया। इस फिल्म ने युवाओं को सोचने पर मजबूर किया।

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चौक्ड (2020)

चौक्ड नोटबंदी जैसे बड़े राजनीतिक फैसले का आम लोगों की जिंदगी पर असर दिखाने वाली फिल्म है। इसमें एक साधारण बैंक कर्मचारी की जिंदगी दिखाई गई है, जिसकी रोजमर्रा की परेशानियां अचानक सरकार की नीतियों से और कठिन हो जाती हैं। फिल्म ने यह संदेश दिया कि बड़े-बड़े फैसले अक्सर आम जनता की तकलीफों को नजरअंदाज कर लेते हैं।

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दोबारा (2022)

दोबारा एक साइ-फाई थ्रिलर है, लेकिन इसके जरिए अनुराग कश्यप ने समाज की सोच और विज्ञान की संभावनाओं को जोड़ने की कोशिश की। यह फिल्म समय, नियति और इंसानी फैसलों पर सवाल उठाती है। कहानी टाइम ट्रैवल और रहस्य के इर्द-गिर्द घूमती है, पर इसमें यह संदेश छिपा है कि इंसान अपने अतीत और फैसलों से कितना बंधा हुआ है।

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कैनेडी (2023)

कैनेडी एक डार्क थ्रिलर है जो राजनीति, अपराध और इंसानी मानसिकता की गहराइयों को उजागर करती है। फिल्म का नायक एक ऐसा पुलिसकर्मी है जो अपराधियों और सिस्टम के बीच फंसा हुआ है। यह फिल्म समाज के उस चेहरे को सामने लाती है जहां कानून और अपराध की रेखाएं धुंधली हो जाती हैं। भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग और इंसानी अकेलापन इन सबको फिल्म ने गहरे अंदाज में पेश किया।

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