नेपाल की राजधानी काठमांडू में 8 सितंबर 2025 की सुबह जो घटनाक्रम शुरू हुआ, उसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सिर्फ चार दिनों में सरकार का ताश के पत्तों की तरह बिखर जाना और प्रधानमंत्री का देश छोड़कर बाहर जाना, राजनीतिक इतिहास का अभूतपूर्व क्षण माना जा रहा है। इस बदलाव के पीछे की असली ताक़त एक नई पीढ़ी रही, जिसे आज हम जेनरेशन ज़ेड (Gen-Z) के नाम से जानते हैं।
सोशल मीडिया पर पाबंदी से शुरू हुई आग
नेपाल सरकार ने 4 सितंबर को फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप समेत 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पाबंदी लगा दी थी। सरकार का कहना था कि ये कंपनियां नेपाल में पंजीकृत नहीं हैं। लेकिन जेन जेड के लिए ये अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला था। डिजिटल युग में पले-बढ़े इन युवाओं के लिए सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा है।
8 सितंबर की सुबह काठमांडू के दरबार स्क्वायर से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन तेजी से पूरे देश में फैल गया। हजारों युवा सड़कों पर उतर आए। उनके हाथों में स्मार्टफोन थे और नारा था – “हमारा इंटरनेट, हमारा अधिकार।”
चार दिन में सत्ता का सफाया
Gen-Z की इस लहर के सामने सरकार की एक न चली। 9 सितंबर को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने दुबई के लिए उड़ान भरी। 10 सितंबर को राष्ट्रपति ने इस्तीफा दे दिया। वित्त मंत्री को भीड़ ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। संसद भवन में आग लगा दी गई। 11 सितंबर तक पूरी सरकार बिखर चुकी थी।
कौन है यह जेन जेड पीढ़ी
Gen-Z यानी जेनरेशन जेड उन लोगों को कहते हैं जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए हैं। आज इनकी उम्र 13 से 28 साल के बीच है। ये पीढ़ी इंटरनेट और स्मार्टफोन के साथ बड़ी हुई है। इन्हें डिजिटल नेटिव्स भी कहते हैं क्योंकि ये जन्म से ही तकनीक से घिरे रहे हैं।
भारत में आज करीब 37 करोड़ जेनरेशन ज़ेड (Gen-Z) मौजूद हैं, जो देश की कुल जनसंख्या का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। ये पीढ़ी सिर्फ संख्या के लिहाज़ से बड़ी नहीं है, बल्कि अपने विचारों और सक्रियता के कारण भी खास पहचान रखती है। दुनियाभर में इन्हें उनकी जागरूक सोच, सामाजिक न्याय के समर्थन और पर्यावरण के मुद्दों पर गहरी चिंता के लिए जाना जाता है।
Gen-Z की खूबियां और चुनौतियां
ये पीढ़ी “हाइपरकॉग्निटिव” है, यानी कई स्रोतों से जानकारी लेकर फैसला करती है। ये रियल और वर्चुअल दुनिया के बीच आसानी से संतुलन बिठाते हैं। हालांकि ये जलवायु परिवर्तन, आर्थिक अस्थिरता और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को लेकर चिंतित भी रहती है।
डेलॉइट द्वारा 2025 में किए गए सर्वे में सामने आया कि लगभग 89 प्रतिशत जेनरेशन ज़ेड (Gen-Z) मानती है कि काम सिर्फ आजीविका कमाने का ज़रिया नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें उद्देश्य और मायने भी होने चाहिए। ये पीढ़ी केवल पैसों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि अपने करियर में संतुलन, व्यक्तिगत खुशहाली और लगातार विकास पर भी ज़ोर देती है।
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