बॉम्बे हाई कोर्ट ने गणपति प्रतिमाओं को विसर्जन को लेकर बड़ा फैसला लिया है। कोर्ट ने बाणगंगा में गणपति प्रतिमाओं के विसर्जन से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह मूर्ति का विसर्जन केवल बाणगंगा में ही करे। भगवान गणपति को विसर्जन करने की इच्छा रखने वाले लोग चौपाटी में बाप्पा को विसर्जित कर सकते हैं। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने पवित्र बाणगंगा तालाब में गणपति प्रतिमाओं को विसर्जन करने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया है। दरअसल मुंबई में अभी गणपति उत्सव चल रहा है और पूजा समाप्ति के बाद लोग गणपति बाप्पा की प्रतिमा विसर्जित कर रहे हैं।
इसी से जुड़ी एक याचिका को कार्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस मुकदमे की सुनवाई करते हुए कहा, “जब न्यायालय के सामने किसी व्यक्तिगत अधिकार को लागू करने से जुड़ा कोई मुद्दा आता है, चाहे वह नागरिक का मौलिक अधिकार हो या समुदाय का अधिकार, तो न्यायालय को हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी व्यक्ति को होने वाली कोई कठिनाई या नागरिक के अधिकार के उल्लंघन मात्र से ही उस याचिका को स्वीकार नहीं कर लिया जाएगा।”
MPCB अधिसूचना से नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
यहां आपको बता दें कि याचिकाकर्ता संजय शिर्के ने अदालत से गुहार लगाई थी कि महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) की अधिसूचना की वजह से नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। इसमें 6 फीट से कम ऊंचाई वाली सभी गणपति मूर्तियों को कृत्रिम तालाबों में विसर्जित करने को कहा गया है। ऐसे में अदालत ने कहा कि महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा 26 अगस्त को जारी किए गए दिशा-निर्देश जिनमें बाणगंगा तालाब और अन्य प्राकृतिक निकायों में पर्यावरण अनुकूल गणेश मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगाई गई थी जो आम जनता के हित में थे। इसमें बदलाव नहीं किया जाएगा।
अदालत ने कहा था कि कृत्रिम तालाबों में 6 फीट से अधिक ऊंची मूर्तियों के विसर्जन में कठिनाई होगी और इस वर्ष 6 फीट से अधिक ऊंची मूर्तियों को प्राकृतिक जलाशयों में विसर्जित करने की अनुमति दी गई थी। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि MPCB ने ऐसी अधिसूचना जारी करके उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का उल्लंघन किया है।
‘कृत्रिम टैंकों के उपयोग के लिए प्रोत्साहन था’
महाराष्ट्र सरकार की ओर से बहस कर रहे महाधिवक्ता डॉ. बीरेंद्र सराफ ने याचिका में की गई प्रार्थनाओं का विरोध किया और कहा कि MPCB की 26 अगस्त 2025 की अधिसूचना का उद्देश्य आम लोगों को सभी प्रकार की मूर्तियों के विसर्जन के लिए कृत्रिम टैंकों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना है और किसी भी स्थिति में याचिकाकर्ता को बाणगंगा में पर्यावरण के अनुकूल मूर्तियों के विसर्जन की अनुमति मांगने का कोई पूर्ण मौलिक अधिकार नहीं है।
बाणगंगा में मूर्ति विसर्जन की नहीं दी अनुमति
सराफ ने कहा, “बाणगंगा एक विरासत संरचना और संरक्षित स्मारक है। पास में कृत्रिम तालाब बने हैं और किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह मूर्ति का विसर्जन केवल बाणगंगा में ही करे। वह उसे थोड़ा आगे चौपाटी तक ले जाकर वहीं विसर्जित कर सकता है। मुंबई में मूर्तियों के विसर्जन के लिए पर्याप्त स्थान हैं।” उन्होंने बताया कि पुरातत्व विभाग ने बाणगंगा में मूर्तियों के विसर्जन की कोई अनुमति नहीं दी है।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद पीठ ने कहा, “हम इस बात से संतुष्ट नहीं हैं कि इस मामले में किसी नोटिस की भी आवश्यकता है।” पीठ ने आगे कहा कि याचिका में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए आधारभूत तथ्यों का अभाव है। पीठ ने कहा, “याचिकाकर्ता ने बाणगंगा में भगवान गणेश का विसर्जन करने वाले व्यक्तियों की संख्या और समय के बारे में कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं कराया गया है।”
इसके बाद हाईकोर्ट ने बाणगंगा झील और शहर के अन्य प्राकृतिक जलाशयों में पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन की अनुमति मांगने वाली याचिका खारिज कर दी।
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