दीवाली, भारत और दुनिया भर में मनाया जाने वाला एक प्रमुख हिंदू त्योहार है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर, बुराई से अच्छाई की ओर और अज्ञान से ज्ञान की ओर जाने का प्रतीक है। यह त्योहार मुख्य रूप से भगवान राम के अयोध्या लौटने और रावण पर विजय प्राप्त करने की खुशी में मनाया जाता है। दीवाली का मतलब होता है “दीपों की पंक्ति”, और इस दिन लोग अपने घरों को दीपों, मोमबत्तियों और रंग-बिरंगे पटाखों से सजाते हैं।
यह पर्व आमतौर पर कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है, जो अक्टूबर और नवंबर के बीच आता है। दीवाली न केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों द्वारा, बल्कि सिखों, जैनियों और बौद्धों द्वारा भी मनाई जाती है, प्रत्येक समुदाय के अपने अलग-अलग धार्मिक कारण और परंपराएं हैं। इसके साथ ही, दीवाली का महत्व समृद्धि, सुख, और समृद्धि के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है, और इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है ताकि घर में सुख-शांति और धन की आशीर्वाद प्राप्त हो सके।
लेकिन, भारत के कुछ ऐसे हिस्से जहां दिवाली का त्योहार नहीं मनाया जाता है। जी हां, यह सुनने में अजीब लगता है की हिन्दू बहुल वाले देश में हिन्दू त्योहार न मनाया जाता हो लेकिन यह बात पूरी तरह से सच है। आइये हम जानते है आखिर वह कोनसी जगह है जहां दिवाली नहीं मनाया जाता और इसके पीछे की वजह सुन आप हैरान हो जायेंगे।
भारत में दिवाली न मनाया जाना वाला राज्य
1) केरल –
भारत के दक्षिणी राज्य केरल में कुछ स्थानों पर दिवाली का उत्सव नहीं मनाया जाता। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला, केरल में यह माना जाता है कि दिवाली के दिन ही उनके महान राजा महाबली की मृत्यु हुई थी। महाबली राजा केरलवासियों के लिए बहुत आदरणीय हैं, और उनकी याद में यहां ओणम का त्योहार मनाया जाता है। दिवाली का दिन उनके लिए शोक का प्रतीक है, इसलिए वे इसे उत्सव के रूप में नहीं मनाते।
दूसरा कारण यह है कि केरल में अक्टूबर और नवंबर के महीने में भारी बारिश होती है। इस समय में बारिश की वजह से पटाखे जलाना और दीप जलाना मुश्किल हो जाता है। अक्सर बारिश के कारण दीपों और पटाखों का आनंद नहीं लिया जा सकता, और इसलिए यहां दिवाली का जश्न बड़े पैमाने पर नहीं मनाया जाता। हालांकि, कोच्चि जैसे कुछ स्थानों पर लोग दिवाली मनाते हैं, लेकिन राज्य के बाकी हिस्सों में यह उत्सव सामान्य नहीं है।
२) हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सें –
लाहौल और स्पीति, जो हिमाचल प्रदेश का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, वहां दिवाली का उत्सव नहीं मनाया जाता। इसकी मुख्य वजह यहां का कठोर मौसम और प्रकृति से जुड़ी हुई है। इस क्षेत्र में सर्दियां बहुत ज्यादा होती हैं, और जैसे ही सर्दी का मौसम आता है, लोग अपने घरों में बंद हो जाते हैं। यहां के अधिकांश लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं, और वे दीपावली की बजाय “लोसर” पर्व मनाते हैं, जो उनके नववर्ष का प्रतीक होता है। लोसर के दौरान लोग पारंपरिक नृत्य करते हैं, एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और नए साल का स्वागत करते हैं। यह त्योहार उनके धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा है, जो दीपावली से अलग अपनी विशेषता और महत्व रखता है।
3) मिजोरम और नागालैंड –
भारत के पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम और नागालैंड में अधिकांश लोग ईसाई धर्म को मानते हैं, और यहां क्रिसमस को सबसे बड़े त्योहार के रूप में मनाया जाता है। इस कारण से, इन राज्यों में दीवाली का उत्सव प्रचलित नहीं है। हालांकि, हाल के वर्षों में कुछ शहरों में दीवाली मनाई जाती है, लेकिन यह उत्सव पारंपरिक रूप से नहीं मनाया जाता। यहां के लोग अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार क्रिसमस को ही प्रमुख त्योहार मानते हैं। फिर भी, समय के साथ बदलते हुए समाज में दिवाली की हल्की-फुल्की उपस्थिति देखने को मिलती है, लेकिन यह अन्य राज्यों की तरह धूमधाम से नहीं मनाई जाती।
4) पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से
पश्चिम बंगाल में मां काली की पूजा का बहुत विशेष महत्व है, और यहां दिवाली के बजाय काली पूजा मनाई जाती है। इसे स्थानीय भाषा में “श्यामा पूजा” भी कहा जाता है, और इस दिन बंगाल में मां काली की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। काली पूजा के दौरान, लोग अपने घरों में दीप जलाते हैं, लेकिन इसे दिवाली के रूप में नहीं मनाया जाता। यह बंगाल की अपनी सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है, जहां शक्ति की देवी मां काली का एक महत्वपूर्ण स्थान है। मां काली के प्रति यह श्रद्धा और पूजा इस राज्य की धार्मिक परंपराओं और विश्वासों का अहम हिस्सा है, और यहां की संस्कृति में इस पूजा का विशेष महत्व है।
दीवाली का असली अर्थ
दीवाली का मतलब केवल दीप जलाना नहीं, बल्कि अंधकार को दूर करना है, चाहे वह बाहरी हो या भीतर का। जो राज्य इसे नहीं मनाते, वे भी अपने ढंग से “दीप” जलाते हैं, कुछ पर्यावरण के लिए, कुछ परंपरा के लिए, और कुछ आत्म-सम्मान के लिए। यह समझना जरूरी है कि “दीवाली न मनाना” किसी विद्रोह या अस्वीकार का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन के अपने अर्थ खोजने की प्रक्रिया है।
भारत का हर कोना अपनी अलग कहानी कहता है। कुछ जगहें दीवाली की रोशनी में डूबी हैं, तो कुछ अपनी शांति में अर्थ खोज रही हैं। जहां एक ओर अयोध्या की गलियां दीपों से जगमगा उठती हैं, वहीं केरल और नागालैंड अपनी शांति में गहरी सीख छिपाए हैं, कि हर प्रकाश का अर्थ समान नहीं होता। कभी-कभी दीप न जलाना भी एक तरह की रोशनी है, जो हमें यह याद दिलाती है कि संस्कृति केवल परंपरा नहीं, बल्कि संवेदना का नाम है।
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