गंगा नदी के पास बसा राघोपुर इलाका हमेशा से बिहार की राजनीति में बहुत खास रहा है। यहाँ चारों तरफ पानी ही पानी होता है, और अब सियासत की हवाएँ भी तेजस्वी यादव को हर तरफ से चुनौती दे रही हैं। यह जगह सिर्फ एक छोटा-सा एरिया नहीं है, बल्कि यह लालू परिवार की पुरानी ताकत की पहचान है। लेकिन इस बार के बिहार चुनाव में सब कुछ बदल गया है, और यह लड़ाई सबकी नजरों में आ चुकी है। तेजस्वी यादव, जो राष्ट्रीय जनता दल की तरफ से चुनाव लड़ रहे हैं, उन्हें न सिर्फ पुराने दुश्मनों से लड़ना पड़ रहा है, बल्कि ऐसे उम्मीदवारों से भी सामना करना पड़ रहा है जो उनके घर के लोगों की तरह लगते हैं। ये लोग उनका वोट बाँटने का काम कर रहे हैं।
गंगा के बीच बसी इस जगह की सियासी कहानी
राघोपुर वैशाली जिले का वह हिस्सा है, जो गंगा और उसकी छोटी नदियों से घिरा है। इसलिए यह थोड़ा अलग सा लगता है, पर राजनीति में हमेशा गर्म रहता है। यहाँ की मिट्टी में यादव समुदाय की मजबूत पकड़ है, जो करीब 30 फीसदी वोट बनाते हैं। इन्हीं वोटों के दम पर लालू यादव, राबड़ी देवी और अब तेजस्वी ने सालों तक जीत हासिल की। पर अब लग रहा है कि यादव वोटों का कुछ हिस्सा बीजेपी की तरफ जा सकता है। वहीं, राजपूत, जो दूसरे नंबर पर हैं, वे नई पार्टियों को मौका दे सकते हैं। दलित और दूसरे पिछड़े वर्ग के लोग भी नतीजे में अहम रोल निभा रहे हैं, क्योंकि भूमिहार समुदाय ज्यादातर एनडीए के साथ खड़ा रहता है। इस बार चुनाव नवंबर के पहले और दूसरे हफ्ते में हो रहे हैं, और गिनती 14 नवंबर को होगी, इसलिए राघोपुर की यह लड़ाई पूरे बिहार को रास्ता दिखा सकती है।
तेजस्वी यादव की पुरानी मजबूती और नई परेशानी
तेजस्वी प्रसाद यादव यहाँ से तीसरी बार लड़ रहे हैं। पिछली बार 2020 में उन्होंने 30 हजार से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की थी, जबकि उससे पहले 2015 में यह अंतर 13 हजार के आसपास था। पर अब मुश्किलें बढ़ गई हैं, क्योंकि महागठबंधन में आरजेडी के साथ कांग्रेस और वाम दल हैं, जबकि एनडीए में बीजेपी और जेडीयू की जोड़ी दमदार हो रही है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव की जनशक्ति जनता दल ने भी उम्मीदवार उतार दिया है। यह उम्मीदवार यादव वोटों को काट सकता है। इसके अलावा, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने एक राजपूत चेहरे को चुना है, ताकि ऊपरी जातियों का साथ मिले। अल्पसंख्यक वोटों पर भी सबकी नजर है। युवा लोग नौकरी और विकास की बात कर रहे हैं, जबकि महिलाओं की संख्या 2 लाख से ऊपर पहुँच गई है, जो फैसले को और कठिन बना सकती है।
बीजेपी के सतीश कुमार यादव का पुराना अनुभव
बीजेपी ने सतीश कुमार यादव को टिकट दिया है, जो यादव समुदाय से ही आते हैं और श्यामचंद रामपुर गाँव के रहने वाले हैं। उन्होंने 2010 में राबड़ी देवी को 13 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था, जो एक बड़ा झटका था। लेकिन 2015 में वे तेजस्वी से हार गए। इसके बाद वे बीजेपी में आ गए और 2020 में भी लड़े, पर जीत नहीं पाए। इस बार उनकी कोशिश है कि यादवों का एक बड़ा हिस्सा एनडीए की तरफ झुके, और कुर्मी तथा भूमिहार वोटों का फायदा मिले, क्योंकि संगठन को बूथ स्तर पर मजबूत किया गया है। सतीश ने अपना राजनीतिक सफर आरजेडी से शुरू किया था, लेकिन अब वे एनडीए की रणनीति का हिस्सा हैं, जो राघोपुर को जीतने की कोशिश में लगे हैं।
तेज प्रताप के उम्मीदवार प्रेम कुमार की भूमिका
प्रेम कुमार, जो जनशक्ति जनता दल से लड़ रहे हैं, वे तेज प्रताप यादव के करीबी हैं और पहले आरजेडी में खूब सक्रिय रहे। चकसिकंदर गाँव के इस आदमी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति की और राम विलास पासवान के समय में लोजपा के छात्र विंग का काम संभाला। 2015 में लालू के कहने पर आरजेडी जॉइन की और तेजस्वी की जीत में साथ दिया, लेकिन बाद में नाराज होकर अलग हो गए। अब वे तेज प्रताप की पार्टी से तेजस्वी के खिलाफ हैं, जिससे परिवार के अंदर की यह लड़ाई और दिलचस्प हो रही है। प्रेम का सारा ध्यान यादव वोटों पर ही है, जिससे तेजस्वी की राह में रुकावटें आ सकती हैं।
जन सुराज के चंचल सिंह का नया चेहरा
चंचल सिंह को जन सुराज ने चुना है। वे 37 साल के हैं और राजपूत समुदाय से आते हैं। वे जेडीयू के व्यापारिक विंग के प्रांतीय महासचिव रह चुके हैं। वे होटल और रियल एस्टेट के धंधे में हैं, जिनका कारोबार हाजीपुर, विदुपुर और दिल्ली तक फैला है। नमामी गंगे योजना में सोनपुर और सिमरिया घाट के कामों में उनका योगदान रहा है, जो उन्हें स्थानीय मुद्दों से जोड़ता है। प्रशांत किशोर ने उन्हें ऊपरी जातियों को लुभाने के लिए उतारा है, ताकि राजपूत वोट एक साथ आएं और तेजस्वी का गणित बिगड़ जाए। चंचल का आना एक नई हवा ला रहा है, क्योंकि युवा और व्यापारी वर्ग उन्हें पसंद कर सकता है।
जाति और विकास के बीच खिंची यह जंग
राघोपुर में यादवों की संख्या सबसे ज्यादा है, लेकिन जीत के लिए दलित, ओबीसी, मुस्लिम और राजपूत जैसे समूहों का मेल-जोल जरूरी है। अगर यादव वोट बँटते हैं, तो बीजेपी को फायदा हो सकता है, जबकि राजपूतों की एकता जन सुराज को मजबूत करेगी। जानकारों का कहना है कि गंगा के पानी की तरह यहाँ की राजनीति भी बदलती रहती है, और हर बार नया मोड़ लाती है, जहाँ तीन यादव उम्मीदवार और एक राजपूत के बीच का मुकाबला देखने लायक है। महिलाओं और युवाओं का ध्यान विकास की ओर है, जो पुरानी विरासत को चुनौती दे रहा है।
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