संयुक्त राष्ट्र (UN) के 80 साल पूरे होने पर भारत ने दुनिया के सामने एक मजबूत और साफ संदेश दिया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में हुए कार्यक्रम में कहा कि आज दुनिया संघर्ष और अविश्वास से भरी है, ऐसे समय में शांति की जरूरत पहले से ज्यादा है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र अपनी मुख्य जिम्मेदारी ‘दुनिया में शांति और न्याय बनाए रखने’ में असफल रहा है। उन्होंने सीधे कहा, “All is not well with the UN”. जयशंकर के मुताबिक, आज की बहसें बहुत ज्यादा बंटी हुई हैं और बड़े फैसले उन देशों की ज़रूरतों को नहीं दिखाते जो विकासशील हैं। भारत का मानना है कि जब तक UN में सब देशों को बराबर प्रतिनिधित्व और अधिकार नहीं मिलेंगे, तब तक यह संस्था अपनी विश्वसनीयता खोती जाएगी।
आतंकवाद पर दोहरा मापदंड उजागर
भारत ने एक बार फिर दुनिया को चेताया कि आतंकवाद पर अब दोहरा रवैया नहीं चल सकता। जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद के पीड़ितों और अपराधियों को एक जैसा मानना बेहद खतरनाक है। उन्होंने कहा, “जब घोषित आतंकवादियों को प्रतिबंध सूची से बचाया जाता है, तो यह उन देशों की नीयत पर सवाल उठाता है जो खुद को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला बताते हैं।” यह बयान साफ तौर पर चीन और पाकिस्तान की ओर इशारा था। चीन कई बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के नेताओं को प्रतिबंधित करने से रोक चुका है। जयशंकर ने यह भी कहा कि कुछ स्थायी सदस्य खुलेआम उन संगठनों का बचाव करते हैं जो कश्मीर जैसे इलाकों में हमलों की जिम्मेदारी लेते हैं।
सुधारों की मांग, 1945 की सोच अब नहीं चलेगी
जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया 1945 से बिल्कुल अलग है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद अब भी पुराने ढांचे में फंसी हुई है। भारत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्र आज वैश्विक शक्ति-संतुलन में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं, फिर भी उन्हें स्थायी सदस्यता नहीं मिली है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर संयुक्त राष्ट्र को प्रासंगिक बने रहना है, तो उसमें बड़े और गहरे सुधार जरूरी हैं। भारत का मानना है कि सुधार की प्रक्रिया को खुद यूएन सिस्टम ने रोक रखा है, जिससे यह मंच कुछ चुनिंदा देशों के प्रभाव तक सीमित होकर रह गया है।
भारत की भूमिका और भविष्य की दिशा
भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र का समर्थन किया है, लेकिन अब यह स्पष्ट कर दिया है कि समर्थन का मतलब चुप रहना नहीं है। जयशंकर ने कहा कि भारत एक जिम्मेदार और भरोसेमंद साझेदार के रूप में वैश्विक दक्षिण की आवाज उठाता रहेगा। उन्होंने कहा कि आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक असमानता और भू-राजनीतिक तनाव जैसी समस्याओं का हल तभी निकलेगा जब संयुक्त राष्ट्र न्यायपूर्ण और सबको शामिल करने वाला मंच बने। 80 साल बाद यह साफ दिख रहा है कि यूएन अपनी मूल भावना शांति, सुरक्षा और न्याय से भटक गया है। भारत का संदेश स्पष्ट है- अब बदलाव का समय आ गया है, वरना इतिहास संयुक्त राष्ट्र को असमय करार देने में देर नहीं करेगा।
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