बांग्लादेश में पिछले तीन दिनों से हिंसा लगातार जारी है। 18 दिसंबर की हिंसा के बाद लगा था कि हालात सुधरेंगे, लेकिन 19 दिसंबर को भी हिंसा जारी रही। इस दिन उदिची शिल्पी गोष्ठी के दफ्तर पर हमला हुआ, वहां तोड़फोड़ की गई और फिर दफ्तर को आग लगा दी गई। जैसे ही युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत की खबर पक्की हुई, ढाका और बाकी बड़े शहरों में हालात बेकाबू हो गए। लोग झुंड बना कर सड़कों पर उतर आए, जोर-जोर से नारे लगने लगे, तोड़फोड़ और आगजनी शुरू हो गई। गुस्सा इतना था कि सिर्फ सरकार ही नहीं, मीडिया भी निशाने पर आ गया। देर रात सैकड़ों लोग ढाका में प्रोथोम आलो और द डेली स्टार के दफ्तरों तक जा पहुंचे और वहां आग लगा दी। चंद घंटों में ही माहौल इतना बुरा हो गया कि अखबार के पत्रकारों और बाकी कर्मचारियों को जान बचाने के लिए दफ्तर छोड़ना पड़ा। आज ढाका में उस्मान हादी को दफनाया जाएगा, इससे पहले उनकी जनाजे की नमाज अदा की जाएगी।
कौन थे शरीफ उस्मान हादी, क्यों थे असरदार
32 साल के शरीफ उस्मान हादी जुलाई आंदोलन से उभरने वाले उन युवाओं में थे, जिन्होंने पुरानी राजनीति को खुलकर चुनौती दी। वे ‘इंकलाब मंच’ नाम के छात्र संगठन के संयोजक और प्रवक्ता थे, जो सत्ता के केंद्रीकरण और राजनीति के एकाधिकार के खिलाफ आवाज उठाता था। ढाका यूनिवर्सिटी से पढ़े हादी खुद को नई पीढ़ी की उम्मीदों का चेहरा मानते थे। उन्होंने न सिर्फ अवामी लीग, बल्कि विपक्षी दलों की भी तीखी आलोचना की।
चुनाव से पहले हादी मौत
पुलिस के मुताबिक, 12 दिसंबर को ढाका के मोटिजील इलाके में नकाबपोश हमलावरों ने हादी को गोली मार दी। हालत बिगड़ने पर उन्हें सिंगापुर ले जाया गया, लेकिन छह दिन बाद उनकी मौत हो गई। जैसे ही अंतरिम मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने मौत की पुष्टि की, देश भर में हिंसा भड़क गई। आज ढाका में उस्मान हादी को दफनाया जाएगा, इससे पहले उनकी जनाजे की नमाज अदा की जाएगी। उनकी मौत के बाद, बांग्लादेश की मोहम्मद युनूस सरकार ने एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया है और लोगों से जनाजे में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने की अपील की गई है। ऐसे में डर है कि इस मौके पर फिर से हिंसा भड़क सकती है। बांग्लादेश अब जिहादियों के प्रभाव में बढ़ता जा रहा है, जहां जिहादी संगठन सड़कों पर सक्रिय हैं और युनूस सरकार उनके अनुसार ही काम कर रही है।
प्रेस की आजादी पर सीधा वार
इस हिंसा में अखबारों के दफ्तरों पर भी हमले हुए। प्रोथोम आलो के कार्यकारी संपादक सज्जाद शरीफ ने कहा, ये बांग्लादेशी पत्रकारिता के लिए सबसे डरावनी रात थी। जब पत्रकार अगले दिन का अखबार और वेबसाइट तैयार कर रहे थे, तभी हमला हो गया। आग और भगदड़ ने सब कुछ रोक दिया। पहली बार, 27 साल में, अखबार छप ही नहीं सका और वेबसाइट भी घंटों तक बंद रही। मीडिया संस्थानों और मानवाधिकार संगठनों ने इस हमले को प्रेस की आजादी पर बड़ा हमला बताया और सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की।ये सब ऐसे वक्त में हुआ है जब बांग्लादेश चुनाव की तैयारी में है और पड़ोसियों, खासकर भारत के साथ रिश्तों की दिशा पर भी सबकी नजर है।
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