बिहार की धरती पर चुनाव का बिगुल बजते ही सियासत में एक नया जोश भर गया है, जहां हर गली-नुक्कड़ पर उम्मीदवारों की दौड़ लगी हुई है। चुनाव आयोग ने 6 अक्टूबर 2025 को तारीखों का ऐलान किया, जिसमें 243 सीटों के लिए दो चरणों में वोटिंग होगी। पहला चरण 6 नवंबर को 91 सीटों पर, दूसरा 11 नवंबर को बाकी 152 पर, और नतीजे 14 नवंबर को आएंगे। नामांकन प्रक्रिया पहले चरण के लिए 14 अक्टूबर से शुरू हो चुकी है, और इसी के साथ मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट यानी आचार संहिता ने पूरे राज्य को कड़ाई की चपेट में ले लिया है। यह संहिता पार्टियों, उम्मीदवारों और सरकारी अधिकारियों पर नजर रखती है, ताकि चुनाव साफ-सुथरा और निष्पक्ष तरीके से हो सके। बिहार जैसे राज्य में जहां पैसे का खेल आम है, यह नियम वोट खरीदने और अनुचित प्रभाव को रोकने का बड़ा हथियार बन जाता है।
आचार संहिता ने पैसे की उड़ान रोकी
आचार संहिता लागू होते ही बिहार की सड़कों पर फ्लाइंग स्क्वाड और स्थिर निगरानी टीमें सक्रिय हो जाती हैं, जो हर संदिग्ध वाहन को रोककर तलाशी लेती हैं। अगर कोई व्यक्ति 50 हजार रुपये से ज्यादा नकद लेकर घूमता दिखे या 10 हजार से ऊपर की नई चीजें साथ हों, तो उसे तुरंत पूछताछ करनी पड़ती है। व्यक्ति को बताना पड़ता है कि पैसा कहां से आया, क्यों ले जा रहा है और किस काम के लिए इस्तेमाल करेगा। अगर जवाब संतोषजनक न हो, तो वह रकम जब्त हो जाती है। यह कदम वोटरों को प्रभावित करने या प्रचार के लिए गलत खर्च रोकने के लिए है। बिहार में चुनावी खर्च पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं, और यह व्यवस्था पारदर्शिता लाने का प्रयास है। नामांकन के पहले दिन ही कई जिलों में छोटी-मोटी जब्तियां हो चुकी हैं।
जब्त कैश का क्या होता है सफर
जब पुलिस या चुनाव टीम नकद पैसे जब्त करती है, तो वह रकम सबसे पहले स्थानीय थाने में सुरक्षित रखी जाती है और फिर आयकर विभाग को सौंप दी जाती है। अगर राशि 10 लाख रुपये या उससे ज्यादा हो, तो इसे जिला खजाने में जमा कर दिया जाता है, और आयकर के नोडल अधिकारी को सूचना दे दी जाती है। विभाग जांच करता है कि पैसा वैध कमाई का है या चुनावी हेरफेर से जुड़ा। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती जाती है, ताकि निर्दोष व्यक्ति परेशान न हो। बिहार चुनाव 2025 में नामांकन से पहले ही टीमें अलर्ट मोड में हैं, और सड़कों पर नाकाबंदी आम हो गई है।
दावा साबित करो, पैसा वापस पाओ
अगर जब्त पैसे का मालिक साबित कर दे कि यह उसकी साफ कमाई है और चुनाव से कोई लेना-देना नहीं, तो रकम लौटा दी जाती है। इसके लिए बैंक स्टेटमेंट, पासबुक एंट्री, एटीएम रसीद, निकासी स्लिप या भुगतान का प्रमाण दिखाना पड़ता है। जिला स्तर पर एक कमिटी बनाई जाती है, जिसमें चुनाव कार्यालय का खर्च निगरानी अधिकारी और जिला खजाने का अधिकारी शामिल होते हैं। यह कमिटी हर मामले की जांच करती है, और अगर सब कुछ साफ लगे, तो पैसा तुरंत वापस कर दिया जाता है। लेकिन अगर कोई दावा न करे या दस्तावेज न दे पाए, तो वह रकम सरकारी खजाने में चली जाती है। इसके बाद कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है, जैसे आयकर चोरी या चुनावी उल्लंघन का मुकदमा। बिहार में यह नियम वोटरों का विश्वास बढ़ाता है।
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