अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी आज 11 अक्टूबर 2025 को भारत के सहारनपुर जिले में देवबंद पहुंचे, जहां वे दारुल उलूम देवबंद का दौरा करेंगे और यहां के विद्वानों से मिलेंगे। यह छह दिन की यात्रा का हिस्सा है, जो 9 अक्टूबर को दिल्ली से शुरू हुई थी। मुत्तकी पहले ही विदेश मंत्री एस जयशंकर से मिल चुके हैं, और अब ताजमहल का भी दौरा करेंगे। दारुल उलूम देवबंद एक सदियों पुराना इस्लामी शिक्षण संस्थान है, जो हनफी विचारधारा का बड़ा केंद्र माना जाता है। मुत्तकी का यह दौरा तालिबान की वैचारिक जड़ों को मजबूत करने का संकेत देता है, क्योंकि देवबंदी आंदोलन ने 19वीं सदी में ब्रिटिश राज के खिलाफ मुसलमानों को एकजुट किया था।
दारुल उलूम देवबंद की शुरुआत, 1857 के विद्रोह से जन्म
दारुल उलूम देवबंद की नींव 1866 में रखी गई, जब 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम दब चुका था और मुसलमानों को धार्मिक और शैक्षिक मार्गदर्शन की सख्त जरूरत महसूस हो रही थी। मौलाना मुहम्मद कासिम नानोतवी और हाजी आबिद हुसैन ने चट्टा मस्जिद के एक छोटे कमरे से इसे शुरू किया, जो धीरे-धीरे दुनिया का बड़ा इस्लामी केंद्र बन गया। यहां कुरान, हदीस और फिक्ह की गहन पढ़ाई होती है, और हजारों छात्र पाकिस्तान, अफगानिस्तान समेत कई देशों से आते हैं। देवबंदी आंदोलन ने मुसलमानों को ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने की प्रेरणा दी, और आज यह सुन्नी हनफी विचारधारा का प्रतीक है। इस संस्थान ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान में कई मदरसों को जन्म दिया, जो इस्लामी शिक्षा की जड़ें फैलाते हैं।
पाकिस्तान में दारुल उलूम हक्कानिया, तालिबान की पाठशाला
भारत में दारुल उलूम देवबंद है तो पाकिस्तान के अकोरा खट्टक में दारुल उलूम हक्कानिया इसका बड़ा रूप है, जो 1947 में अब्दुल हक ने स्थापित किया था। अब्दुल हक खुद देवबंद से पढ़े थे, और हक्कानिया को तालिबान की वैचारिक पाठशाला कहा जाता है। यहां तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर ने शिक्षा ली थी, और अब्दुल हक के बेटे सामी उल हक को तालिबान का बाप माना जाता है। 1980 के दशक में सोवियत-अफगान युद्ध के समय यहां हजारों अफगान शरणार्थी आए और जिहाद की शिक्षा ली। हक्कानिया से तालिबान के कई बड़े नेता निकले, जैसे हक्कानी नेटवर्क के सरगना जलालुद्दीन हक्कानी और उनके बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी, जो अब अफगानिस्तान के आंतरिक मंत्री हैं। यह मदरसा देवबंदी विचारधारा पर चलता है, लेकिन पाकिस्तान में यह कट्टर रूप ले चुका है।
तालिबान और देवबंद का गहरा रिश्ता
तालिबान की पूरी विचारधारा देवबंदी इस्लाम से निकली है, जो मूल रूप से भारत की देसी जड़ों वाली है। 1857 के विद्रोह के बाद देवबंद ने मुसलमानों को धार्मिक शिक्षा देकर ब्रिटिशों से लड़ना सिखाया। यह आंदोलन अफगानिस्तान पहुंचा और पाकिस्तान के मदरसों में फैल गया। हक्कानिया जैसे संस्थानों ने तालिबान को जन्म दिया, लेकिन तालिबान खुद को देवबंद का सच्चा वारिस मानता है। मुत्तकी का यह दौरा ऐतिहासिक जुड़ाव को और मजबूत करने का प्रयास लगता है। दारुल उलूम देवबंद के मौलाना अरशद मदनी ने कहा है कि तालिबान देवबंदी परंपरा से प्रेरित हैं, लेकिन वे अफगानिस्तान की आजादी के लिए लड़ रहे हैं। यह यात्रा तालिबान की वैधता बढ़ाने का एक बड़ा कदम है।
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