बिहार का मिथिला अपनी अनोखी लोक परंपराओं और गहरी सांस्कृतिक जड़ों के लिए देशभर में मशहूर है। इन्हीं में से एक है चौरचन, जिसे यहां पूरे उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है। इस साल मिथिला में चौरचन पर्व 27 अगस्त को मनाया जाएगा, जिसे लेकर अभी से श्रद्धालुओं में उत्साह का माहौल है। आपको जानकर हैरानी होगी, कि बाकी देश में जहां भादो की चतुर्थी के चांद को अशुभ मानकर देखने से बचा जाता है, वहीं मिथिला में इसी दिन का चांद छठ के सूर्य की तरह पूजा जाता है।इस दिन सुबह गणेश पूजा के बाद व्रत रखा जाता है, घरों में खीर-पूरी, मिठाई और पकवान बनते हैं, और शाम को सभी चांद निकलने का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। जब चांद आसमान में झांकता है, तो लोग प्रसाद के तौर पर तरह तरह के पकवान सजाकर, भोग अर्पित कर, उसका दर्शन करते हैं।
क्या है कलंकित चांद की कहानी?
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार गणेश जी के गिरने पर चंद्रमा ने उनका मजाक उड़ाया था, जिससे नाराज़ होकर गणेश जी ने उन्हें श्राप दिया कि इस दिन जो तुम्हें देखेगा, वो कलंक का भागी बनेगा। श्रीकृष्ण तक इस श्राप से नहीं बच पाए और चोरी के झूठे आरोप का सामना किया।तो अब सवाल उठता है कि, फिर मिथिला वाले इस दिन चांद क्यों देखते हैं? तो इसका जवाब है एक ऐतिहासिक घटना।
क्यों की जाती है पूजा?
एक समय की बात है, जब मिथिला नरेश हेमांगद ठाकुर, जिन्हें लगान चुकाना पसंद नहीं था, दिल्ली के बादशाह के सामने कर चोरी के आरोप में कैद कर दिए गए। कैद में रहते हुए उन्होंने खगोल गणना से आने वाले 500 सालों तक के सूर्य और चंद्र ग्रहण की तारीखें बता दीं। जब उनकी भविष्यवाणी सच निकली, बादशाह ने न केवल उन्हें रिहा किया बल्कि मिथिला को करमुक्त भी कर दिया। ऐसे में रानी हेमलता ने खुशी में कहा, “आज मिथिला का चांद कलंक मुक्त हो गया है, अब हम इसका पूजन करेंगे।” बस, यहीं से चौरचन की परंपरा शुरू हुई।
आज भी कायम है परंपरा
चौरचन पर हर घर में पकवान बनाना और बांटना जरूरी माना जाता है ताकि कोई भी इस दिन स्वादिष्ट भोजन से वंचित न रहे। छतों और आंगनों में प्रसाद के पकवान सजते हैं, जिनकी महक फैलती है और मिथिला के लोग गर्व से उस चांद का स्वागत करते हैं, जिसे वे ‘सत्य और सौभाग्य’ का प्रतीक मानते हैं।
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