मुंबई: मुंबई को लोग “कभी न सोने वाला शहर” कहते हैं, मगर यहां की सड़कें रोज़ घंटों तक जाम में सुस्त पड़ जाती हैं। TomTom Traffic Index 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल के मुकाबले ट्रैफिक थोड़ा कम हुआ है। लेकिन सच पूछो तो, फर्क आम लोगों की ज़िंदगी में खास नजर नहीं आता। पीक टाइम में एक सामान्य मुंबईकर अब भी हर साल करीब 126 घंटे ट्रैफिक में फंसा रहता है। सोचो, पांच दिन सिर्फ गाड़ियों में बैठे हुए बीत जाते हैं।
रिपोर्ट कहती है, जब दुनिया के और शहरों में ट्रैफिक और बिगड़ा है, मुंबई ने थोड़ा सुधार दिखाया है। मगर ये सुधार बस रिपोर्ट के आंकड़ों में है। असलियत में, जल्दी काम पर पहुंचने की भागदौड़, रात को थके-हारे घर लौटना, हर तरफ़ हॉर्न, ये सब जस के तस हैं। रोज़मर्रा की कहानी बिल्कुल नहीं बदली।
लोअर परेल से बीकेसी, हर दिन की भागदौड़
लोअर परेल, अंधेरी या फिर बीकेसी, इन इलाकों में काम करने वालों के लिए ट्रैफिक एक कभी खत्म न होने वाली चुनौती है। लोअर परेल तो वैसे भी शहर का ऐसा इलाका है, जो साउथ मुंबई को उपनगरों से जोड़ता है, लेकिन ट्रैफिक के मामले में ये सबसे सुस्त कॉरिडोरों में गिना जाता है। शाम के वक्त यहां औसत रफ्तार सिर्फ 16.9 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है। कोस्टल रोड, मेट्रो, इन प्रोजेक्ट्स से भले कुछ हिस्सों में राहत मिली हो, लेकिन अंदरूनी पतली गलियां और बढ़ती गाड़ियों की तादाद राहत को बहुत छोटा बना देती है। नतीजा, थोड़ी सी दूरी तय करने में भी वक्त निकल जाता है, घर पहुंच कर थकान बाकी रहती है।
10 किलोमीटर की दूरी, 35 मिनट की थकान
रिपोर्ट के आंकड़े रोज़ के हालात को बिलकुल साफ़-साफ़ बताते हैं। पीक टाइम में सिर्फ 10 किलोमीटर चलने में करीब 35 मिनट 30 सेकंड लगते हैं। इसका मतलब है कि गाड़ी में बैठकर, क्लच, गियर और ब्रेक के बीच उलझे रहना। TomTom के अनुसार, 16 सितंबर 2025 सबसे खराब दिन था, जब ट्रैफिक सामान्य दिनों से 129% ज्यादा था। ऐसे दिन ऑफिस से देर से निकलना, घर पहुंचकर बच्चों के साथ समय नहीं बिता पाना और सिर में दर्द होना आम बात हो जाती है।
दुनिया से तुलना और आगे की सोच
वैश्विक रैंकिंग में मुंबई ट्रैफिक जाम के मामले में 18वें नंबर पर है। भारत के बड़े शहरों में ये कहीं बीच में है। अच्छा ये है कि अब औसतन 15 मिनट में 5.2 किलोमीटर तक सफर हो जाता है। सुबह की रफ्तार 18.5 किलोमीटर प्रति घंटा है, शाम के मुकाबले कुछ बेहतर। दूसरे भारतीय शहरों की हालत और भी खराब है। बेंगलुरु दुनिया में दूसरे नंबर पर है, भारत में नंबर वन, यहां लोग साल में 168 घंटे ट्रैफिक में गवा देते हैं। पुणे, दिल्ली, कोलकाता भी ऊपर-ऊपर हैं।
मुंबई के लिए ये रिपोर्ट सीधी चेतावनी है, सिर्फ कागज़ों पर सुधार से कुछ नहीं होगा, जब तक सड़क पर चलने वालों को राहत न मिले। बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट, स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट, और थोड़ी समझदारी वाली शहर-योजना, यही इस न खत्म होने वाले जाम से मुंबई को बाहर निकाल सकते हैं।
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