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ग्रीनलैंड विवाद पर ट्रंप ने लिया बड़ा एक्शन, अमेरिका ने यूरोप के 8 देशों पर लगाए टैरिफ; पूर्व NSA ने किया आलोचना

ट्रंप का ग्रीनलैंड पर आक्रामक रुख और यूरोपीय देशों पर टैरिफ की चेतावनियों ने ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में दरार डाल दी। यूरोप ने इसे संप्रभुता का मुद्दा बताया, NATO और आर्कटिक पर बहस बढ़ी।

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Trump Tariff: आर्कटिक में बसा ग्रीनलैंड सिर्फ बर्फ से ढका एक द्वीप नहीं है, ये जगह आजकल दुनिया की बड़ी ताकतों के लिए असली सेंटर बना हुआ है। यहां छिपे खनिज, बदलते समुद्री रास्ते और इसका खास सैन्य महत्व, सब मिलकर इसे अमेरिका, रूस और चीन के लिए बड़ा आकर्षण बना देते हैं। इसी वजह से डोनाल्ड ट्रंप काफी वक्त से इसे अपने कंट्रोल में लेना चाहते रहे हैं। लेकिन ग्रीनलैंड अब भी डेनमार्क के अधीन है और वहां की सरकार ने साफ कह दिया है, कोई भी बड़ा फैसला उन्हीं और स्थानीय लोगों की मंजूरी से ही होगा। डेनमार्क के इस रुख के बाद यूरोप के कई देशों ने खुलकर उसका साथ दिया। अब मामला सिर्फ अमेरिका-डेनमार्क तक नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सामने आ गया है।

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टैरिफ लगाने से बढ़ा अमेरिका-यूरोप के बीच तनाव

यूरोपीय सपोर्ट देखकर ट्रंप नाराज़ हो गए और उन्होंने डेनमार्क समेत आठ यूरोपीय देशों पर नए टैरिफ लगाने की धमकी दे डाली। पहले 10%, फिर 25% तक बढ़ाने की बात कही। ट्रंप का कहना है, अमेरिका सालों से यूरोप को सुरक्षा और कारोबार में मदद करता आ रहा है, अब वक्त आ गया है कि इसका हिसाब चुकता किया जाए। ये बयानबाज़ी अब आर्थिक रिश्तों को सीधा राजनीतिक हथियार बना रही है।

अमेरिका के भीतर से ही उठी आलोचना

मजेदार बात ये है कि खुद अमेरिका के अंदर से भी ट्रंप की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। उनके पुराने नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र (NSA) जॉन बॉल्टन ने इसे “बेतुका” कह डाला। बॉल्टन मानते हैं कि ग्रीनलैंड वाकई वेस्टर्न सिक्योरिटी के लिए ज़रूरी है, लेकिन अपने ही दोस्तों पर टैरिफ थोपना आर्कटिक में स्थिरता को कमजोर कर देगा। उनका कहना है, ऐसे फैसलों से रूस और चीन को ही फायदा मिलता है, क्योंकि पश्चिमी देशों की सबसे बड़ी ताकत उनकी आपसी एकता है।

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यूरोप ने दिया एक साथ रिएक्शन

यूरोपीय यूनियन की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास ने साफ कहा, अगर पश्चिमी देशों में दरार पड़ी तो रूस और चीन को ही फायदा होगा। उनका मानना है, ग्रीनलैंड की सुरक्षा से जुड़ा कोई भी मामला NATO के दायरे में ही सुलझना चाहिए। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने टैरिफ की धमकियों को सिरे से खारिज किया, बोले- संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा, चाहे बात यूक्रेन की हो या ग्रीनलैंड की। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर भी यही लाइन पकड़ते हैं, NATO के साथियों पर आर्थिक दबाव डालना सामूहिक सुरक्षा की भावना के ही खिलाफ है।

आगे क्या होगा?

ये पूरा विवाद ग्रीनलैंड से कहीं आगे की बात है। असल में ये तय करेगा कि पश्चिमी देश मिलकर आगे आने वाली मुश्किलों से कैसे निपटेंगे। टैरिफ पॉलिटिक्स से शायद कुछ वक्त के लिए दबाव बन जाए, लेकिन लंबी दौड़ में ये न सिर्फ आर्थिक नुकसान पहुंचाती है, बल्कि भरोसा भी डगमगा देती है। आर्कटिक की सुरक्षा हो या जलवायु परिवर्तन, या फिर चीन-रूस जैसी ताकतों की चुनौती, अमेरिका और यूरोप के लिए सबसे समझदारी उसी में है कि वो आपस में बातचीत और सहयोग बढ़ाएं। अगर ट्रांस-अटलांटिक रिश्ते डगमगाए, तो पूरी दुनिया में बैलेंस बनाए रखना और भी मुश्किल हो जाएगा।

Keywords: Greenland Dispute, Donald Trump Tariffs, Denmark Sovereignty, Arctic Security, NATO Allies, EU Response, US Europe Relations

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