अनिल अंबानी की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। रिलायंस ग्रुप की दिवालिया हो चुकी कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCom) और उनके नाम से जुड़े लोन अकाउंट को अब बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) ने भी फ्रॉड घोषित कर दिया है। यह फैसला उनके लिए तीसरा बड़ा झटका है, क्योंकि इससे पहले स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने जून 2025 में और बैंक ऑफ इंडिया (BoI) ने 24 अगस्त 2025 को इसी तरह का कदम उठाया था।
आरकॉम का पक्ष
कंपनी की ओर से जारी बयान में कहा गया कि बैंक ऑफ बड़ौदा जिन लोन की बात कर रहा है, वे उस दौर के हैं जब कंपनी कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में नहीं गई थी। आरकॉम का तर्क है कि चूंकि कंपनी IBC (Insolvency and Bankruptcy Code) के तहत रेज़ोल्यूशन और लिक्विडेशन प्रक्रिया में है, इसलिए इन लोन से जुड़े विवादों का निपटारा भी इसी ढांचे के अंदर होना चाहिए।
आरकॉम ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि
कंपनी की क्रेडिटर्स कमेटी पहले ही एक रेज़ोल्यूशन प्लान को मंजूरी दे चुकी है।यह प्रस्ताव अब नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के अप्रूवल का इंतज़ार कर रहा है।कंपनी फिलहाल एक रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल के नियंत्रण में है और अनिल अंबानी अब इसके निदेशक (Director) नहीं हैं।आगे की रणनीति और कानूनी रास्ते तय करने के लिए लीगल टीम से सलाह ली जा रही है।
आरोप और विवाद
बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया था कि साल 2016 में बड़े पैमाने पर फंड डायवर्जन (फंड का गलत इस्तेमाल) हुआ था। अब बैंक ऑफ बड़ौदा का फैसला इस विवाद को और गहरा करता है। लगातार तीन बड़े बैंकों द्वारा लोन अकाउंट को फ्रॉड घोषित किए जाने से न सिर्फ अनिल अंबानी की व्यक्तिगत विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि कॉरपोरेट लोन सिस्टम की पारदर्शिता और निगरानी को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
ईडी की जांच
इस बीच अनिल अंबानी पहले से ही प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच के दायरे में हैं। ईडी रिलायंस ग्रुप की कंपनियों से जुड़े लगभग 17,000 करोड़ रुपये के कथित लोन फ्रॉड की पड़ताल कर रही है। इसे अब तक की सबसे बड़ी कॉरपोरेट लोन फ्रॉड जांचों में से एक माना जा रहा है। पिछले महीने ही अनिल अंबानी को पूछताछ के लिए बुलाया गया था।
आगे क्या होगा?
IBC प्रक्रिया के चलते फिलहाल यह मामला NCLT की मंजूरी पर टिका है। अगर रेज़ोल्यूशन प्लान को मंजूरी मिलती है तो लोन विवाद का समाधान उसी के जरिए होगा। वहीं, अगर लिक्विडेशन का रास्ता अपनाया गया तो बैंक और अन्य कर्जदाता अपनी रिकवरी प्रक्रिया शुरू करेंगे।
यह केस केवल अनिल अंबानी और RCom की कानूनी व वित्तीय मुश्किलों को ही नहीं दर्शाता, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि भारतीय बैंकिंग सिस्टम में कॉरपोरेट लोन की निगरानी और रिस्क मैनेजमेंट कितनी मज़बूत है।
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