प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 3 जनवरी को नई दिल्ली के राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर में भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन करेंगे। इस प्रदर्शनी का शीर्षक है , ‘द लाइट एंड द लोटस: रिलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन’। यह प्रदर्शनी पहली बार पिपरहवा के उन अवशेषों को एक साथ प्रस्तुत कर रही है, जिन्हें सौ साल से अधिक समय बाद भारत वापस लाया गया है। इसके साथ ही पिपरहवा से जुड़े प्रामाणिक अवशेष और पुरातात्विक सामग्री भी प्रदर्शित की गई हैं, जो राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली और भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में सुरक्षित रखी गई हैं।
प्रदर्शनी को अलग-अलग विषयों के आधार पर सजाया गया है। इसके केंद्र में सांची स्तूप से प्रेरित एक पुनर्निर्मित मॉडल रखा गया है, जिसमें राष्ट्रीय संग्रहों के प्रामाणिक अवशेषों के साथ स्वदेश लौटाए गए रत्न प्रदर्शित हैं। अन्य खंडों में पिपरहवा रिविजिटेड, बुद्ध के जीवन की झलकियां, मूर्त में अमूर्त: बौद्ध शिक्षाओं की कला, सीमाओं के पार बौद्ध कला और विचारों का प्रसार, तथा सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी: निरंतर प्रयास को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया गया है।
Tomorrow, 3rd January, is a very special day for those passionate about history, culture and the ideals of Bhagwan Buddha.
— Narendra Modi (@narendramodi) January 2, 2026
At 11 AM, the Grand International Exposition of Sacred Piprahwa Relics related to Bhagwan Buddha, ‘The Light & the Lotus: Relics of the Awakened One’, will… pic.twitter.com/V6bPwZjsK7
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि 3 जनवरी इतिहास, संस्कृति और भगवान बुद्ध के आदर्शों में रुचि रखने वालों के लिए एक बेहद खास दिन है। उन्होंने कहा कि सुबह 11 बजे, भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी ‘द लाइट एंड द लोटस: रिलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन’ का उद्घाटन राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर, दिल्ली में किया जाएगा।
पीएम मोदी ने यह भी बताया कि इस प्रदर्शनी में पिपरहवा के वे अवशेष शामिल हैं, जिन्हें एक सदी से अधिक समय बाद स्वदेश वापस लाया गया है, साथ ही पिपरहवा से प्राप्त प्रामाणिक अवशेष और पुरातात्विक सामग्री भी प्रदर्शित की गई है, जो राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली और भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में संरक्षित हैं।
आम लोगों के लिए सरल प्रस्तुति
आम जनता की समझ बढ़ाने के लिए प्रदर्शनी में आधुनिक ऑडियो-विजुअल सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इसमें इमर्सिव फिल्में, डिजिटल पुनर्निर्माण, व्याख्यात्मक प्रोजेक्शन और मल्टीमीडिया प्रस्तुतियां शामिल हैं। इन माध्यमों से भगवान बुद्ध के जीवन, पिपरहवा अवशेषों की खोज और उनके महत्व को सरल रूप में समझाया गया है। साथ ही बुद्ध के संदेशों के प्रसार और उनसे जुड़ी कला परंपराओं की जानकारी भी दी गई है।
क्या हैं पिपरहवा और कब हुई थी खोज?
साल 1898 में एक अंग्रेज एस्टेट मैनेजर और इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेपे ने उत्तर प्रदेश में स्तूप की खुदाई के दौरान पिपरहवा अवशेषों की खोज की थी। इस खोज में भगवान बुद्ध की अस्थियों के अंश, राख, सोने के आभूषण और कीमती रत्न मिले थे। पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार पिपरहवा स्थल का संबंध प्राचीन कपिलवस्तु से स्थापित होता है, जिसे वह स्थान माना जाता है जहाँ भगवान बुद्ध ने संन्यास ग्रहण करने से पहले अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष बिताए थे।
खोज में मिले अवशेषों को तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है और इन्हें बौद्ध अनुयायियों द्वारा स्थापित किया गया था। पिपरहवा के अवशेषों को दुनिया भर के बौद्ध समुदाय के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है।
खुदाई के दौरान मिले भगवान बुद्ध से जुड़े अधिकांश अवशेषों को 1899 में कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में संरक्षित कर दिया गया था। हालांकि, कुछ अवशेष खोजकर्ता पेपे परिवार के पास रह गए थे, जिन्हें बाद में देश से बाहर ले जाया गया।
नीलामी रोककर भारत लाया गया धरोहर
‘इंडियन ट्रेजर ट्रोव एक्ट, 1878’ के तहत ब्रिटिश सरकार ने पिपरहवा अवशेषों के अधिकांश हिस्से पर दावा किया था, लेकिन खोज का लगभग पांचवां हिस्सा पेपे परिवार को रखने की अनुमति दी गई थी।
पिछले साल मई में पेपे परिवार के पास मौजूद इन अमूल्य धरोहरों की हांगकांग में सोथबी (Sotheby’s) के जरिए नीलामी प्रस्तावित थी। जैसे ही इसकी जानकारी भारत सरकार को मिली, सरकार ने तुरंत हस्तक्षेप किया और इन अवशेषों की नीलामी रोककर स्वदेश वापसी सुनिश्चित की।
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