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अमेरिका के 70 प्रतिशत जनसंख्या है मोटापे से ग्रसित, क्या है मोटापे की नई परिभाषा?

क्या आप जानते है,अमेरिका की 70 प्रतिशत जनसंख्या मोटापे से ग्रसित है। एक रीसर्च के मुताबिक मोटापे की नई परिभाषा बताता है कि अमेरिका में मोटापे की वास्तविक तस्वीर पहले से कहीं अधिक गंभीर है।

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मोटापे के बारे में बात करें तो अब तक हम सब BMI यानी बॉडी मास इंडेक्स पर ही टिके रहे हैं। यही एक पैमाना था, जो दशकों से तय करता आया है कि कौन स्वस्थ है और किसे खतरा है। लेकिन, अब वैज्ञानिक ये सवाल उठा रहे हैं, क्या सच में सिर्फ वजन और कद देखकर हम किसी के स्वास्थ्य का सही अंदाजा लगा सकते हैं?

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अब इसी बहस के बीच लैंसेट डायबिटीज एंड एंडोक्रिनोलॉजी कमीशन (The Lancet Diabetes & Endocrinology Commission) ने मोटापे की एक बिल्कुल नई और एकदम अलग परिभाषा सामने रखी है। जब इसे अपनाया गया, तो नतीजे वाकई चौंकाने वाले थे, अमेरिका में मोटापे की दर 40% से बढ़कर सीधे 70% तक जा पहुंची। ये सिर्फ आंकड़ों का फेरबदल नहीं है, बल्कि सोच का भी बड़ा बदलाव है। आइए जानते है आखिर क्या है ये नई परिभाषा।

MGB के शोधकर्ताओं के अनुसार मोटापे की नई परिभाषा

Mass General Brigham के नई प्रस्तावित परिभाषा में BMI के साथ-साथ अन्य शारीरिक मापों को भी शामिल किया गया है। इनमें कमर की परिधि (Waist Perimeter), कमर-से-ऊंचाई अनुपात (Waist-To-Height ratio) और कमर-से-कूल्हे अनुपात (Waist-To-Hip Ratio) जैसे मापने के तरीके जोड़ दिए गए हैं। इस ढांचे के तहत मोटापे को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहली कैटेगरी में वो लोग हैं, जिनका BMI ज्यादा है और साथ में कम से कम एक और शारीरिक माप भी खतरे के दायरे में है। दूसरी कैटेगरी उन लोगों की है, जिनका BMI तो ‘सामान्य’ है, लेकिन दो या उससे ज्यादा शारीरिक माप खतरनाक लेवल पर हैं। इस ग्रुप को पहले ‘स्वस्थ’ माना जाता था, अब पता चला है कि असल में इन पर भी भारी जोखिम मंडरा रहा है।

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क्या है BMI की सीमाएं?

BMI का सबसे बड़ा प्रॉब्लम ये है कि ये सिर्फ वजन और ऊंचाई देखता है, लेकिन शरीर में चर्बी कहां जमा है, ये नहीं बताता। मान लीजिए दो लोग, जिनका बीएमआई बराबर है, उनमें से एक के पास ज्यादा मसल्स हो सकती हैं, तो दूसरे के पेट पर चर्बी ज्यादा हो सकती है। पेट के आस-पास जमा ये चर्बी (जिसे विसरल फैट कहते हैं) दिल की बीमारियों, टाइप-2 डायबिटीज और कई दूसरी गंभीर दिक्कतों से जुड़ी है। फिर भी, BMI इस खतरे को अक्सर पकड़ ही नहीं पाता। इसी वजह से कई लोग जिनका वजन ‘नॉर्मल’ दिखता है, वे भी अंदर ही अंदर बीमारियों से जूझ रहे होते हैं।

हैरान करने वाले आंकड़े

मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम के शोधकर्ताओं ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के “ऑल ऑफ अस रिसर्च प्रोग्राम” के तहत 3 लाख से अधिक अमेरिकियों के डेटा खंगाला। पहले, यानी पुराने बीएमआई पैमाने पर, 42.9% लोग मोटापे की कैटेगरी में आते थे। नई परिभाषा आई, तो ये आंकड़ा सीधे 68.6% तक पहुंच गया। इस उछाल की सबसे बड़ी वजह वही लोग थे, जिन्हें सिर्फ शारीरिक माप के आधार पर मोटापे में डाला गया था। उम्र के साथ तो फर्क फर्क साफ़ दिखा, 70 साल से ऊपर के करीब 80% लोग अब मोटापे की कैटेगरी में आ गए हैं।

सामान्य वजन, लेकिन असल में ज्यादा रिस्क

इस स्टडी का सबसे परेशान करने वाला हिस्सा यही था, नए परिभाषा से पहचाने गए समूहों में स्वास्थ्य जोखिम काफी अधिक पाए गए। जिन लोगों को पहले मोटापे में नहीं गिना जाता था, उनमें मधुमेह, हृदय रोग और मृत्यु दर मोटापे रहित लोगों की तुलना में अधिक थी। करीब आधे प्रतिभागियों को ‘क्लिनिकल मोटापा’ की कैटेगरी में रखा गया जिसका मतलब है ऐसा मोटापा, जो अभी से शरीर और अंगों को नुकसान पहुंचा रहा है। यह दिखाता है कि समस्या केवल भविष्य के खतरे की नहीं, बल्कि वर्तमान स्वास्थ्य संकट की भी है।

प्रधानमंत्री मोदी ने भी बढ़ते मोटापे पे चिंता जताई

अपने 79वें स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीति से हटकर एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया, भारत में मोटापे का बढ़ता हुआ खतरा। अपने भाषण में उन्होंने बताया कि जीवनशैली में बदलाव, खराब आहार और शारीरिक गतिविधियों की कमी की वजह से गैर-संक्रामक बीमारियां जैसे डायबिटीज, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप बढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा, “आने वाले वर्षों में मोटापा हमारे देश के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।” उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अगर हर परिवार खाना पकाने के तेल का इस्तेमाल 10% कम कर दे, तो यह राष्ट्र की सेहत के लिए फायदेमंद होगा।

हेल्थ पॉलिसी में बदलाव की जरूरत

नई परिभाषा स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए कई अहम सवाल खड़े करती है। अचानक मोटापे की शिकार आबादी बढ़ गई, तो इलाज की प्राथमिकता कैसे तय होगी? क्या अब वजन कम करने की दवाएं, लाइफस्टाइल में बदलाव और दूसरे ट्रीटमेंट ज्यादा लोगों के लिए जरूरी हो जाएंगे? रिसर्चर्स का कहना है, इस नए ग्रुप के लिए अलग तरह की ट्रीटमेंट स्ट्रेटेजी चाहिए। खासतौर पर पेट की चर्बी पर फोकस करना होगा जिसमे संतुलित खाना, रोजाना फिजिकल एक्टिविटी और स्ट्रेस कंट्रोल पर ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा।

अब सिर्फ वजन नहीं, पूरी तस्वीर देखे

इस रिसर्च का सीधा मैसेज है, सेहत का अंदाजा सिर्फ तराजू के नंबर से मत लगाओ। शरीर की बनावट, चर्बी कहां जमा है, और आपकी लाइफस्टाइल सबका रोल है। आगे डॉक्टर, पॉलिसी मेकर और आम लोगों, सबको मोटापे को एक जटिल और कई लेयर वाली समस्या की तरह देखना पड़ेगा। ये नई परिभाषा किसी को डराने के लिए नहीं है, बल्कि वक्त रहते खतरे को पहचानकर सही कदम उठाने का मौका देती है। अब बस, ‘वजन कम है तो सब ठीक है’ वाली सोच को पीछे छोड़ने का वक्त आ गया है।

Keywords: Obesity, Metabolic Health, Diabetes Risk, Heart Disease, Clinical Obesity, Public Health Research

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