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Bihar Election 2025: प्रशांत किशोर के मुद्दे और गठबंधनों की चुनौतियां

Bihar election 2025: बिहार के दोनों प्रमुख गठबंधनों, एनडीए और महागठबंधन के लिए इस चुनाव में ख़तरा बनेंगे प्रशांत किशोर…?

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Bihar Election 2025: बिहार की राजनीतिक ज़मीन पर इन दिनों प्रशांत किशोर (पीके) चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। पिछले तीन वर्षों से वे जिन बुनियादी और ज़मीनी सवालों को उठाकर राजनीति कर रहे हैं, उसने बिहार के दोनों प्रमुख गठबंधनों, एनडीए और महागठबंधन—के लिए ख़तरा पैदा कर दिया है। प्रशांत किशोर उन मुद्दों को धारदार बना रहे हैं, जिन्हें मुख्य विपक्षी दल होने के नाते महागठबंधन (विशेषकर राजद) को उठाना चाहिए था।

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प्रशांत किशोर का ‘मुद्दा’ आधारित राजनीतिक प्रहार

पीके की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने भ्रष्टाचार, अपराध और सुशासन के उन बुनियादी सवालों को चुनावों के ठीक पहले केंद्रीय मुद्दा बना दिया है, जिनसे बड़े दल मुंह चुरा रहे हैं।

भ्रष्टाचार पर सीधा वार

प्रशांत किशोर ने न केवल नीतीश कुमार की सरकार के मंत्रियों और ‘आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त’ अफ़सरों को कटघरे में खड़ा किया है, बल्कि BJP के प्रदेश अध्यक्ष जैसे बड़े नेताओं को भी असहज किया है। उनका यह हमला BJP के केंद्रीय नेतृत्व को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या वर्तमान ‘दलबदलू’ प्रदेश नेतृत्व पर भरोसा करना भविष्य की राजनीति के लिए सही है।

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लालू-नीतीश के 35 साल के शासन पर सवाल

उन्होंने आम लोगों में यह जागरूकता पैदा की है कि पिछले 35 वर्षों से चली आ रही लालू-राबड़ी और नीतीश कुमार की सरकारों के दौरान जिन ज़रूरी मुद्दों का समाधान नहीं हो पाया, उन्हें अब हल करना होगा। यह जागरूकता आम आदमी के मन में ‘बदलाव’ की एक समझ पैदा कर रही है।

सुशासन की धूमिल छवि

वह उस मुद्दे को मजबूती से उठा रहे हैं, जो नीतीश कुमार की ‘सुशासन बाबू’ वाली 2015 से पहले की छवि को तार-तार कर रहा है। कभी नीतीश कुमार के शासन की पहचान रहे 3C’ अपराध भ्रष्टाचार (Corruption), और सांप्रदायिक राजनीति से परहेज़ पर अब बट्टा लगता दिख रहा है।

राममनोहर लोहिया के शब्दों में, प्रशांत किशोर के लिए भले ही यह चुनाव फ़तह करना ज़रूरी न हो, लेकिन अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को जनता तक पहुंचाने में वे कामयाब होते दिख रहे हैं, जिससे दोनों मज़बूत गठबंधनों के बीच उन्होंने अपनी एक जगह बना ली है।

महागठबंधन की चूक और अनिर्णय की स्थिति

जानकारों की मानें तो आम आदमी के सरोकारों से जुड़े इन ज़मीनी मुद्दों को महागठबंधन मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने में नाकाम रहा है।

चुनावी समय का अपव्यय

महागठबंधन ने सरकार विरोधी रुझान को चुनावी मुद्दे में बदलने के बजाय ‘वोटर अधिकार यात्रा’ पर ज़्यादा ध्यान दिया। राहुल गांधी की अगुआई में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ में कीमती समय गंवा दिया गया, वह समय जो नीतीश सरकार को उसके कार्यकाल में घेरने के लिए सबसे महत्वपूर्ण था।

सीट बंटवारे का पेंच

नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख़ नज़दीक होने के बावजूद दोनों गठबंधन, ख़ासकर महागठबंधन, अनिर्णय की दुर्दशा से ग्रस्त दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस द्वारा ज़्यादा सीटों की मांग ने पेंच फंसाया हुआ है। लालू प्रसाद यादव यह भली-भांति समझते हैं कि कांग्रेस को ज़्यादा सीटें देने से महागठबंधन की जीत की संभावनाएँ कम होंगी, क्योंकि ज़मीन पर कांग्रेस की सांगठनिक शक्ति कमज़ोर है।

निर्णायक मुद्दे- जो तय करेंगे चुनाव का रुख

बिहार के चुनाव में कुछ और महत्वपूर्ण कारक होंगे, जो निर्णायक साबित हो सकते हैं… महिलाओं और गैर-यादव पिछड़ी जातियों का रुख क्या नीतीश कुमार की कथित रूप से कमज़ोर होती शारीरिक और मानसिक स्थिति का संदेश गैर-यादव पिछड़ी जातियों तक पहुंच चुका है? क्या उनके समर्थक भी यह समझने लगे हैं कि चुनाव के बाद BJP उन्हें लंबे समय तक नेतृत्व में नहीं रखेगी?

तेजस्वी यादव और स्वजातीय उन्माद

महागठबंधन के लिए एक बड़ा सवाल यह है कि क्या तेजस्वी यादव अपने स्वजातीय (यादव) बंधुओं के ‘अति सत्ता’ और उन्माद को नियंत्रित कर पाएंगे? पिछले चुनावों में इस स्वजातीय उन्माद को ही अन्य पिछड़ी जातियां ‘जंगलराज का पर्याय’ मानने को मजबूर हो गई थीं, जो हार का एक कारण बना।

पैराशूट उम्मीदवार और डील की राजनीति

बीजेपी और पूर्व में कांग्रेस द्वारा आजमाए जा रहे ‘डील’ के ज़रिए तय होने वाले उम्मीदवार भी चुनावी वफ़ादारी और परिणाम पर असर डालेंगे। ये उम्मीदवार धन-संसाधनों से सम्पन्न होते हैं, पर इनकी दलीय वफ़ादारी संदिग्ध रहती है।

प्रशांत किशोर की ‘वोट काटने की क्षमता’

इस चुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी किस गठबंधन को कितना नुकसान पहुंचाएगी, यह उनकी बिहार में भविष्य की राजनीति तय करेगा और दोनों गठबंधनों के लिए निर्णायक साबित होगा।

वर्तमान में, प्रशांत किशोर की मुद्दा-आधारित, बेबाक और निर्भीक राजनीति से दोनों गठबंधन सहमे-सहमे दिख रहे हैं। यदि पीके इसी तरह से ज़मीनी अभियान चलाते रहे, तो बिहार जो बड़े राजनीतिक बदलावों के लिए मशहूर रहा है, संभावना है कि इसकी शुरुआत इसी विधानसभा चुनाव से हो जाए।

Keywords: Prashant Kishor (PK), Jan Suraaj (JS), Anti-Incumbency / Anti-Corruption, Coalition Politics

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