ग्रीन गोल्ड… जो हमारे जीवन का अहम हिस्सा है… जन्म से लेकर मृत्यु तक इसकी खास अहमियत है। इसकी जरुरत जन्म, शादी से लेकर मनुष्य के मरने के बाद भी जिसका इस्तेमाल किया जाता है। आइए जानते हैं कैसे हुई इस ग्रीन गोल्ड की उत्पत्ति और कैसे एक समुदाय के लिए ये देवी का रुप भी है।
आज हम बात कर रहे हैं बांस की वो ग्रीन गोल्ड जिसे लेकर अलग-अलग मान्यताएं और लोक कथाएं हैं। एक बांस अनेक काज… जीवन-मरण के समय बांस की अहम भूमिका होती है। बांस को लेकर समाज में कई मान्यताएं हैं। यहां तक की इसे वंश वृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। हालांकि इसे काटना अशुभ होता है। इस बारे में विज्ञान का भी अपना मत है।
झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदाय के बीच बांस की उत्पत्ति को लेकर एक बेहद दिलचस्प रोचक कथा है। हम सभी जानते हैं कि बांस हमारे समाज में कितनी अहमियत रखता है। इसका कई तरह से इस्तेमाल होता है। जीवन के हर क्षण में बांस की उपयोगिता महसूस की जाती है। बांस से बने उत्पाद तो मानव जीवन का अहम हिस्सा रहे हैं। ऐसे में यह जानना और भी जरुरी हो जाता है कि बांस की उत्पत्ति कैसे हुई।
बांस की उत्पत्ति की मार्मिक लोककथा
यह कहानी है आदिकाल की, जब प्रकृति और मानव के बीच का बंधन गहरा था। एक छोटे से परिवार में एक बहन और उसके 4 भाई रहते थे। भाइयों का जीवन खेती-मजदूरी में बीतता था और बहन घर का काम संभालती थी। उनका जीवन बहुत खुशहाल और प्रेम से भरा था। एक दिन बहन खाना पका रही थी। उसका मन अपने भाइयों के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने में लगा था। तभी उसके रक्त की एक बूंद पकते हुए भोजन में टपक गई। उसने इसे एक छोटी सी घटना मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया।
जब भाई लौटे और उन्होंने भोजन किया, तो उन्होंने महसूस किया कि इतना स्वादिस्ट भोजन उन्होंने पहले कभी नहीं खाया। भोजन में न केवल पोषण था, बल्कि एक अद्भुत मिठास और स्नेह का अनुभव था। उन्होंने उत्सुकता से बहन से पूछा, “बहन, आज के खाने में इतना अनूठा स्वाद क्यों है?” बहन ने सच्चाई बता दी कि कैसे खाना पकाते समय उसके खून की एक बूंद भोजन में मिल गई थी।
यह सुनकर भाइयों के मन में लालच आ गया। सबसे बड़े भाई ने कहा, “अगर इसका रक्त इतना स्वादिष्ट है, तो इसका मांस कितना स्वादिस्ट होगा?” उन्होंने मानवता को ताक पर रखकर अपनी प्यारी बहन की हत्या की षड़यंत्र रचकर हत्या कर दी। क्रूरता की उस घड़ी में, 3 भाइयों ने बहन के शरीर को बांटकर खा लिया। लेकिन चौथा भाई, समय पर नहीं लौटा। जब बाकी भाइयों ने देखा कि चौथा भाई नहीं आ रहा है, तो उन्होंने उसके हिस्से के मांस को, एक पवित्र मिट्टी में गाड़ दिया।
समय बीतता गया। जिस स्थान पर बहन के शरीर का वह हिस्सा दफनाया गया था, वहां कुछ ही दिनों में एक अद्भुत पौधा उग आया। यह पौधा तेज़ी से बढ़ने लगा, सीधा आकाश की ओर, पतले लेकिन मजबूत तने वाला। यह कोई साधारण पेड़ नहीं, बल्कि बांस का पौधा था। कहा जाता है कि तभी से बांस की उत्पत्ति हुई।
बहन के त्याग का प्रमाण
आदिवासी समुदाय का मानना है कि यह बांस, उस बहन के प्रेम, त्याग और बलिदान का प्रतीक है। उसका सीधा, दृढ़ तना उसकी अटूट निष्ठा को दर्शाता है, और इसकी उपयोगिता, जो जीवन से लेकर मृत्यु तक हर क्षण मानव के काम आती है, उसके त्याग का प्रमाण है।
आदिवासी करते है बंसा देवी की पूजा
आज भी, झारखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदाय में बांस केवल एक पौधा नहीं है। यह उनकी बंसा देवी है, जिसकी पूजा की जाती है। वे मानते हैं कि बांस में उनकी बहन की आत्मा का वास है, जो उन्हें वंश-वृद्धि का आशीर्वाद देती है और हर संकट में उनका सहारा बनती है। इस तरह इस समुदाय के बीच बंसा देवी प्रचलित हो गईं। मध्यप्रदेश के भोपाल स्थित जनजातीय संग्राहलय में इस कहानी को आधार बनाते हुए बंसा देवी की कहानी को दर्शाया गया है। 2013 में बने इस संग्रहालय में आज भी आप इस लोक कथा को देख सकते हैं, सुन सकते हैं। बेहद सलीके से बांस के घने जंगल के बीच बंसा देवी को चित्रित किया गया है।
सरकार ने दिया है ग्रीन गोल्ड का दर्जा
एक समय ऐसा था जब बांस से बनी चीजें हमारे घरों में अनिवार्य रूप से देखने को मिल जाती थीं। अब इसकी मांग कुछ कम हुई है, लेकिन खत्म नहीं हुई है। शादी के मंडप में बांस उतना ही अहम होता है, जितना मरने के बाद। भारत सरकार ने इसे ग्रीन गोल्ड का भी दर्जा दे रखा है। बांस के पौधे लगाने के लिए सरकार लोगों को प्रेरित कर रही है। मान्यता है कि बांस के पौधे रखने से सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
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