पूर्व रेल मंत्री मुकुल रॉय का कोलकाता के अपोलो हॉस्पिटल में 71 साल की उम्र में निधन हो गया है। मुकुल रॉय लंबे समय से कोलकाता के अपोलो हॉस्पिटल में एडमिट थे, जहां पिछले कुछ महीनों से उनका कोमा का इलाज चल रहा था। मुकुल रॉय का रात करीब 2:35 बजे कार्डियक अरेस्ट के कारण निधन हो गया। मुकुल रॉय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अत्यंत करीबी सहयोगियों में से एक थे। उन्होंने वर्ष 2009 में शिपिंग मंत्रालय में और 2011 से 2012 तक रेलवे तथा शहरी विकास मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली।
दो साल से चल रहा था इलाज
पिछले दो वर्षों से मुकुल रॉय लगातार स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे और उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ रहा था। समय के साथ उनकी हालत और अधिक नाजुक होती चली गई, यहां तक कि वे अपने परिचित लोगों को भी पहचानने में असमर्थ हो गए थे। डॉक्टरों की देखरेख में उन्हें नाक के जरिए डाली गई राइल ट्यूब से तरल आहार दिया जा रहा था। जानकारी के मुताबिक, सोमवार को उनका पार्थिव शरीर घर लाया जाएगा, जिसके बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
टीएमसी के थे सबसे बड़े नेता
मुकुल रॉय का टीएमसी में कद-काठी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में गिना जाता था और तृणमूल कांग्रेस (TMC) में ममता बनर्जी के बाद उन्हें दूसरे नंबर के नेता के तौर पर देखा जाता था। मुकुल रॉय ने 2017 में पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ज्वाइन कर ली थी। उनके इस फैसले ने हर किसी को हैरान कर दिया था।
फिर TMC में लौटे
मुकुल रॉय ने साल 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़कर विधायक बने। लेकिन उस वक्त फिर लोग हैरान हो गए, जब उन्होंने उसी साल जून महीने में फिर से तृणमूल कांग्रेस में वापसी कर ली। हालांकि, उनके लौटने के बाद टीएमसी में उनकी सक्रियता पहले जैसी नहीं रही।
गौरतलब हो कि मुकुल रॉय तृणमूल कांग्रेस के शुरुआती दौर के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को खड़ा करने में उनकी अहम भूमिका रही। वे कृष्णानगर उत्तर विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। वर्ष 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी की रणनीति तैयार करने और उसे जमीन पर लागू करने में उन्होंने पर्दे के पीछे से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई, जिसका नतीजा टीएमसी की ऐतिहासिक जीत के रूप में सामने आया।
हालांकि, 2017 में नारदा स्टिंग प्रकरण के बाद पार्टी नेतृत्व से उनके मतभेद बढ़ गए और उन्हें संगठन से बाहर का रास्ता दिखाया गया। इसके बाद नवंबर 2017 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा। पार्टी में उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी सौंपी गई और पश्चिम बंगाल में संगठन विस्तार व चुनावी रणनीति तैयार करने में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। लेकिन 2021 में स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बना ली।
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