संपत्ति से जुड़े कानूनी काम और उनका प्रबंधन करने में ‘जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी’ (GPA) एक बहुत ही ज़रूरी कागज़ होता है, जिसके बारे में अक्सर लोग पूरी तरह से सही नहीं जानते हैं। बातचीत में कई बार यह मान लिया जाता है कि अगर किसी व्यक्ति को जीपीए दे दिया जाए, तो इसका सीधा मतलब है कि वह व्यक्ति अब उस संपत्ति का असली और कानूनी मालिक बन गया है, जो कि कानून की नज़र में बिल्कुल गलत है। सच्चाई यह है कि जीपीए संपत्ति को बेचने या किसी और को देने के काम को आसान बनाने वाला एक दस्तावेज़ है, न कि संपत्ति के मालिक को बदलने वाला कागज़।
जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी: केवल काम करने का अधिकार
‘जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी’ (GPA) एक कानूनी दस्तावेज़ है जो एक व्यक्ति (जिसे ‘डोनर’ कहते हैं) किसी दूसरे व्यक्ति (जिसे ‘एजेंट’ या ‘अटॉर्नी’ कहते हैं) को अपनी जगह पर बड़े कानूनी और पैसों से जुड़े काम करने की ताकत देता है। यहाँ ‘जनरल’ शब्द का मतलब यह है कि अटॉर्नी को जो अधिकार मिले हैं, वे किसी एक छोटे काम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये अधिकार किराए पर देने, बैंक खाते चलाने, ज़रूरी बिल भरने, और यहाँ तक कि संपत्ति बेचने के लिए कागज़ों पर मालिक की तरफ से दस्तखत करने जैसे कई कामों को शामिल करते हैं।
जीपीए मालिकी नहीं, केवल प्रतिनिधि बनाती है
कानूनी रूप से यह एकदम साफ़ है कि जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी कभी भी संपत्ति की मालिकी को नहीं बदलती है और संपत्ति का असली कानूनी मालिक हमेशा वही व्यक्ति (डोनर) रहता है जिसने जीपीए दी है। संपत्ति के सरकारी रिकॉर्ड में भी उसी व्यक्ति का नाम मालिक के तौर पर दर्ज रहता है, और जीपीए रखने वाले व्यक्ति का काम सिर्फ मालिक के एक प्रतिनिधि के रूप में काम करना होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि जीपीए धारक सिर्फ़ मालिक की इच्छा और उसके बताए निर्देशों के अनुसार ही काम कर सकता है, उसे केवल मालिक की जगह पर ज़रूरी फैसले लेने और कानूनी काम करने का अधिकार मिलता है, न कि वह संपत्ति को अपनी मान सकता है।
मालिक की मौत के बाद GPA हो जाती है खत्म
जीपीए के तहत दिए गए अधिकार तब तक ही मान्य रहते हैं जब तक या तो GPA को रद्द न कर दिया जाए या फिर मालिक (डोनर) की मृत्यु न हो जाए, और मालिक के मरते ही जीपीए अपने आप खत्म हो जाती है। अगर जीपीए धारक को संपत्ति बेचनी भी है, तो वह बिक्री के कागज़ों पर मालिक की तरफ से हस्ताक्षर करता है, लेकिन संपत्ति को बेचकर जो भी पैसा मिलता है, उस पर अंतिम अधिकार और फायदा मालिक को ही मिलता है, जब तक कि जीपीए के कागज़ में कोई दूसरी बात न लिखी हो।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपना फैसला साफ किया है
भारत के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने कई बार यह बात साफ कर दी है कि जीपीए के ज़रिए संपत्ति का मालिकाना हक़ कानूनी रूप से नहीं बदला जा सकता है। कानूनी तौर पर, संपत्ति का मालिक केवल ‘रजिस्टर्ड बिक्री विलेख’ (पंजीकृत सेल डीड) या किसी वैध वसीयत जैसे कानूनी दस्तावेज़ों के ज़रिए ही बदल सकता है। पहले के समय में, टैक्स बचाने और स्टांप शुल्क से बचने के लिए लोग जीपीए का गलत इस्तेमाल करते थे, जिस वजह से सुप्रीम कोर्ट को इस पर एक कड़ा रुख अपनाना पड़ा है। न्यायालय ने साफ कर दिया है कि GPA, ‘बेचने का समझौता’ (एग्रीमेंट टू सेल) या ‘वसीयत’ जैसे कागज़ों के आधार पर संपत्ति पर मालिकाना हक़ का दावा करना कानून की नज़र में सही नहीं है।
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