कोपेनहेगन: आर्कटिक में बसा ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, और ये डेनमार्क का एक सेमी-ऑटोनॉमस इलाका है। इसकी लोकेशन ऐसी है कि सैन्य नजरिए से भी ये काफी अहम है, और यहां यूरेनियम, आयरन, और कई दुर्लभ खनिजों का बड़ा भंडार है। इसी वजह से दुनियाभर की ताकतें ग्रीनलैंड पर नजरें गड़ाए रहती हैं। 2019 में डोनाल्ड ट्रंप ने खुलकर ग्रीनलैंड को खरीदने का ऑफर दिया था, जिसे डेनमार्क ने झट से खारिज कर दिया। उस वक्त ये मामला काफी चर्चा में रहा और अंतरराष्ट्रीय बहस छिड़ गई थी।
ट्रंप ने दी ताकत की धमकी
अभी हाल में फिर ट्रंप ने इस मुद्दे को हवा दी है। उन्होंने अमेरिका की “राष्ट्रीय सुरक्षा” का हवाला देते हुए कहा कि ग्रीनलैंड उनके लिए बेहद जरूरी है। ट्रंप ने ये भी साफ कर दिया कि अगर डेनमार्क बात नहीं मानता, तो अमेरिका सैन्य विकल्प पर सोच सकता है। यूरोप में इस बयान को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है, क्योंकि ये सीधे एक सहयोगी देश की संप्रभुता को चुनौती देने जैसा है। खासकर, वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मिसाल देकर ट्रंप ने डेनमार्क की चिंता बढ़ा दी है।
Denmark will not hand over Greenland even if the USA threatens us with nuclear weapons.
— Rasmus Jarlov (@RasmusJarlov) January 10, 2026
I am not saying this to stump our chest and try to be tough. We are small and no match for the USA. We know that. But we are not doing it under any circumstances.
डेनमार्क की तीखी प्रतिक्रिया
डेनमार्क की संसद की रक्षा समिति के प्रमुख रास्मस जारलोव ने ट्रंप के दावों की जमकर आलोचना की। उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका को ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह का संप्रभुता दावा करने का हक नहीं है। जारलोव के मुताबिक, ग्रीनलैंड न कोई विवादित इलाका है, न ही वहां कोई ऐसा हालात है कि “सुरक्षा के नाम पर” दखल दिया जाए। उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ बताया और कहा कि किसी देश को दूसरे के इलाके पर जबरन कब्जा करने का कोई अधिकार नहीं है।
The USA already has a defence agreement with Denmark that gives them exclusive and full military access to Greenland. But they are not using it. They have downgraded their presence by 99%.
— Rasmus Jarlov (@RasmusJarlov) January 7, 2026
Now, apparently, they are telling their base that they need to invade and annex Greenland… pic.twitter.com/3b6d5HkuTZ
भारत से समर्थन की अपील
जारलोव ने भारत का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि ग्रीनलैंड भले ही भारत से काफी दूर है, लेकिन यहां जो सिद्धांत दांव पर हैं, वो पूरी दुनिया के लिए अहम हैं। उन्होंने सवाल किया, अगर कोई ताकत भारत के किसी इलाके पर जबरन कब्जा करने लगे, तो भारत क्या करेगा? जारलोव मानते हैं कि भारत जैसे बड़े देश को ऐसी किसी भी कोशिश का खुलकर विरोध करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर दुनिया ऐसे कदमों को “सामान्य” मानने लगे, तो पूरी वैश्विक व्यवस्था बिखर जाएगी।
Every day I wake up to new accusations made by the MAGA camp. Today, Vance blames Europe (ie. Denmark) for not securing a proper missile defence from Greenland.
— Rasmus Jarlov (@RasmusJarlov) January 9, 2026
There is not a missile defence of Europe, Denmark or Greenland itself in Greenland. There is a USA base that protects…
चीन का खतरा या अमेरिकी आक्रामकता?
डेनमार्क के सांसद ने अमेरिका के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि ग्रीनलैंड पर चीन या रूस का कोई खतरा है। उन्होंने कहा, यहां न चीन का दूतावास है, न बड़े खनन प्रोजेक्ट, और न ही कोई सैन्य बेस। यहां तक कि चीनी रेस्तरां भी ढूंढना मुश्किल है। जारलोव ने याद दिलाया कि अगर वाकई कोई बड़ा खतरा होता, तो अमेरिका अपने सैनिकों की संख्या 15,000 से घटाकर सिर्फ 150 पर नहीं लाता। उनके मुताबिक, असली खतरा कहीं और से नहीं, बल्कि खुद अमेरिका के आक्रामक रवैये से है।
Keywords: Greenland Crisis, Donald Trump, Denmark, India Global Role, US Military Threat, International Law

