लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर शुरू हुई विशेष चर्चा ने राजनीति में हलचल मचा दी। इस चर्चा का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत के इतिहास और महत्व को याद करना था, लेकिन जल्दी ही यह बहस राजनीतिक आरोपों की ओर बढ़ गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहस की शुरुआत करते हुए कांग्रेस पर सवाल उठाए। वहीं, विपक्षी नेता अखिलेश यादव ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि सत्ता पक्ष राष्ट्रीय मुद्दों को भी अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहा है।
“वंदे मातरम् सिर्फ गाने का नहीं, निभाने का विषय”
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि “वंदे मातरम् सिर्फ दिखावा नहीं है, इसे जीने और निभाने की जरूरत है।” उन्होंने आरोप लगाया कि आज देश में ऐसे लोग पैदा किए जा रहे हैं जो समाज को बांटने का काम कर रहे हैं, जबकि हमें एकता की जरूरत है। अखिलेश ने यह भी तंज कसा कि सत्ता पक्ष हर चीज का श्रेय लेने में उतावला है, यहां तक कि जो इतिहास उनका नहीं है, उसे भी वे अपना बताने की कोशिश करते हैं। यूपी में प्राथमिक विद्यालयों के एकीकरण पर बात करते हुए उन्होंने राज्य में 26 हजार से अधिक स्कूलों के बंद होने पर चिंता व्यक्त की।
पीएम मोदी का पलटवार
बहस की शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी ने वंदे मातरम् के इतिहास पर प्रकाश डाला और कांग्रेस तथा पंडित नेहरू के रुख पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब 1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखा गया वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा बना, तब मुस्लिम लीग के विरोध के दबाव में कांग्रेस कमजोर पड़ गई थी। पीएम मोदी ने यह भी दावा किया कि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के कुछ हिस्सों को किनारे कर दिया था। 1975 के आपातकाल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय देश की आज़ादी पर हमला किया जा रहा था, लेकिन वंदे मातरम् ने ही लोगों का हौसला बनाए रखा।
राजनीति, इतिहास और वर्तमान का टकराव
बहस के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि एक गहरी ऐतिहासिक भावना और राजनीतिक विमर्श का केंद्र है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए करती है, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि कांग्रेस ने ऐतिहासिक रूप से इन प्रतीकों का सम्मान नहीं किया। यह बहस एक बार फिर इस सवाल को सामने लाती है कि राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक स्वार्थों के बीच संतुलन कैसे बैठाया जाए। 150 वर्षों के इस सफर में वंदे मातरम् ने न केवल देश की आज़ादी, संकट और संघर्ष के हर पल को साकार किया, बल्कि आज भी यह राजनीतिक संवाद का अहम हिस्सा बना हुआ है।
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