बिहार में चुनाव 6 और 11 नवंबर को विधानसभा चुनाव होने हैं और 14 नवंबर को मतगणना का दिन होगा। आज हम आपको भागलपुर दंगे की वो कहानी बताएंगे। जिसमें 108 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। भागलपुर में 1989 में दंगों की पृष्ठभूमि क्या थी,क्या थी तनाव पनपने की वजह, इन दंगों से धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर तनाव ने किस तरह विकराल रूप ले लिया कि मुख्यमंत्री की कुर्सी तर चली गई…
बिहार का महाकांड: भागलपुर दंगे (1989)
बिहार के भागलपुर में अक्टूबर 1989 में हुए दंगो देश के सबसे भयानक सांप्रदायिक दंगों में से एक था। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन दंगों में एक हजार से अधिक लोगों की जान गई थी और लगभग 50,000 से अधिक लोग बेघर हुए थे।
दंगों की पृष्ठभूमि और कारण
धार्मिक तनाव की शुरुआत (अगस्त 1989): दंगों की नींव अगस्त 1989 में पड़ी, जब मुहर्रम और बिशेरी पूजा की तैयारियों को लेकर 2 समुदायों के बीच तनाव देखा गया।
राम मंदिर आंदोलन: इस तनाव के केंद्र में देशव्यापी राम मंदिर आंदोलन था, जिससे दोनों धर्मों में अपने-अपने धर्मों को लेकर जुनून काफी बढ़ चुका था।
रामशिला कार्यक्रम: अक्टूबर में, विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने राम मंदिर निर्माण के लिए 5 दिन के ‘रामशिला’ कार्यक्रम की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य राम मंदिर के लिए ईंटें (शिलाएं) इकट्ठा करना था। इन जुलूसों में हुई नारेबाजी से माहौल और संवेदनशील हुआ।
अफवाहें: हिंसा फैलने के पीछे 2 निराधार अफवाहें सबसे बड़ी वजह बनीं, जिन्होंने पहले से तनावपूर्ण माहौल को और बिगाड़ दिया। अल्पसंख्यक आयोग की 1990 की रिपोर्ट ने भी माना कि ये अफवाहें दंगे भड़काने में अहम भूमिका निभाईं।
दंगों का भड़कना और भयावहता
जुलूस पर हमला (24 अक्टूबर 1989)
दंगों की शुरुआत 24 अक्टूबर 1989 को हुई
रामशिला इकट्ठा करने के लिए निकाले गए जुलूस पर मुस्लिम बहुल तातरपुर क्षेत्र से बम फेंका गया। इस घटना में किसी की जान नहीं गई, लेकिन कुछ पुलिसकर्मी घायल हुए और इसे ही दंगों के भड़कने की मुख्य वजह माना जाता है।
इसके बाद शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया, लेकिन अफवाहों और हिंसा की खबरों से दंगे लगातार बढ़ते चले गए।
चंदेरी और राजपुर की घटना (24-27 अक्टूबर):
भागलपुर में हिंसा का दौर 24 से 27 अक्टूबर तक जारी रहा। पत्रकार सईद नकवी के अनुसार, एक रात में चंदेरी और राजपुर के पास एक घर में 70 लोगों की जान ले ली गई और पास के तालाब से 61 शव निकाले गए थे।
लौगांय गांव का नरसंहार
यह गांव हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। 27 अक्टूबर को भीड़ ने लौगांय में हमला कर दिया, जिसमें अनुमानित 115 लोगों की मौत हुई। पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (PUDR) की रिपोर्ट में बताया गया कि मारे गए लोगों को पहले एक पोखर में, फिर कुएं में फेंका गया। बाद में, उनके शवों को निकालकर एक खेत में गाड़ दिया गया और उस पर गोभी उगा दी गई। दिसंबर 1989 में जांच के दौरान इस खेत से 108 लाशें निकाली गईं।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
मुख्यमंत्री की कुर्सी गई: दंगों के समय बिहार में कांग्रेस की सरकार थी, और मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा थे। हिंसा को नियंत्रित करने में नाकामी के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। उनकी जगह जगन्नाथ मिश्र को मुख्यमंत्री बनाया गया। सिन्हा ने अपनी आत्मकथा में दंगे भड़काने का आरोप कांग्रेस के ही कुछ नेताओं पर लगाया था।
पुलिस-प्रशासन की भूमिका
दंगों के बीच प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भागलपुर एसपी केएस द्विवेदी का ट्रांसफर कर दिया। लेकिन पुलिसकर्मियों और भाजपा-वीएचपी के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया, जिसके बाद राजीव गांधी को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। बाद में, जस्टिस एनएन सिंह जांच आयोग (2005) ने अपनी रिपोर्ट में दंगों को रोकने में कांग्रेस सरकार की नाकामी और स्थानीय पुलिस व प्रशासन को जानलेवा हिंसा का जिम्मेदार बताया।
कांग्रेस को बड़ा नुकसान: भागलपुर दंगे कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक झटका साबित हुए। अगले चुनावों में कांग्रेस के वोट जनता दल के लालू प्रसाद यादव की तरफ छिटक गए, जिसके बाद कांग्रेस बिहार में कभी भी अपने दम पर सत्ता में वापस नहीं लौटी।
जांच आयोग और सजा
जांच आयोगों का गठन: दंगे के बाद 8 दिसंबर 1989 को तत्कालीन मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने 2 जांच आयोगों का गठन किया। जस्टिस राम चंद्र प्रसाद सिन्हा और जस्टिस एस शम्सुल हसन का आयोग। जस्टिस आरएन प्रसाद का आयोग (इसमें बाद में दो और सदस्य जोड़े गए)।
दंगे के आरोपियों को सजा
दंगों के बाद कुल 142 एफआईआर दर्ज हुईं।
वर्ष 2005 में, भागलपुर दंगे के मामले में 10 लोगों को आजीवन कारावास की सजा हुई।
2007 में, लौंगाय हिंसा के मामले में 14 लोगों को और सजा मिली।
नीतीश कुमार का कदम
2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने जस्टिस एनएन सिंह के नेतृत्व में एक और जांच आयोग का गठन किया, जिसकी रिपोर्ट फरवरी 2015 में आई।
भागलपुर दंगा भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय है, जिसने न सिर्फ हजारों लोगों की जान ली, बल्कि बिहार की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने पर भी गहरा प्रभाव डाला। जानलेवा हिंसा का जिम्मेदार बताया गया
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