लोकसभा में चुनाव सुधारों पर चल रही चर्चा उस समय गरम हो गई जब शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे ने कांग्रेस और उद्धव ठाकरे गुट पर तीखा हमला किया। शिंदे ने कहा कि कांग्रेस, जिसने कभी बाला साहब ठाकरे का मतदान अधिकार छीन लिया था, अब वही पार्टी उद्धव गुट का राजनीतिक समर्थन कर रही है। उनका आरोप था कि कांग्रेस और उद्धव गुट की राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ रही है, और अब वे “लोकतंत्र बचाओ” का नारा देकर नैतिकता का ढोंग कर रहे हैं। शिंदे ने इंदिरा गांधी के चुनाव को इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने और उसके बाद लगाए गए आपातकाल (Emergency ) को लोकतंत्र पर कांग्रेस का बड़ा हमला बताया।
घुसपैठियों और वोट बैंक राजनीति पर निशाना
चर्चा के दौरान शिंदे ने कहा कि कांग्रेस बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को अपना वोट बैंक मानकर नीतियां बनाती रही है। उन्होंने बताया कि मुंबई समेत कई बड़े शहरों में रोहिंग्या की संख्या बढ़ रही है, लेकिन विपक्ष इस पर चर्चा करने के बजाय SIR (Special Intensive Revision) जैसे कानूनों का विरोध कर रहा है। शिंदे के मुताबिक, विपक्ष की यह नीति चुनावी फायदे के लिए है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव के समय विपक्षी नेता विदेश चले जाते हैं और हारने के बाद चुनाव आयोग और EVM पर सवाल उठाते हैं, जो लोकतंत्र को कमजोर करने वाली दोहरी राजनीति है।
उम्मीदवारों की उम्र 21 वर्ष करने और ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की मांग
चुनाव सुधारों पर चर्चा करते हुए शिंदे ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों की न्यूनतम उम्र 25 से घटाकर 21 साल की जानी चाहिए, ताकि युवा राजनीति में अधिक भाग ले सकें। उन्होंने सभी चुनावों के लिए एक समान मतदाता सूची, ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ मॉडल लागू करने और प्रवासी मजदूरों के लिए रिमोट वोटिंग की सुविधा शुरू करने की सिफारिश की।
शिंदे ने यह भी कहा कि भारत दुनिया की सबसे सशक्त लोकतांत्रिक व्यवस्था के रूप में उभरा है, जहां महिलाओं को शुरुआत से ही समान मतदान अधिकार मिले, जबकि अमेरिका जैसे देशों में इसे लागू होने में 144 साल लगे। उन्होंने यह भी बताया कि EVM के आने के बाद चुनावों में हिंसा में कमी आई है, और कश्मीर व गढ़चिरोली जैसे संवेदनशील इलाकों में भी रिकॉर्ड मतदान हो रहा है।
डॉ. आंबेडकर के चुनाव प्रसंग का जिक्र
शिंदे ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहा कि देश के पहले आम चुनाव (1952) में कांग्रेस ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को संसद से दूर रखने की कोशिश की थी। उनके मुताबिक, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खुद आंबेडकर के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा किया, और जब आंबेडकर की जीत तय लगने लगी, तो 74,333 वोटों को अवैध घोषित कर दिया गया। शिंदे ने बताया कि इस कारण आंबेडकर करीब 14,000 वोटों से हार गए, और इसे कांग्रेस की “वोटचोरी की शुरुआत” करार दिया। उन्होंने इसे लोकतंत्र के साथ धोखा बताते हुए कहा कि आज विपक्ष नैतिकता की बात करता है, जबकि इतिहास इसके ठीक विपरीत है।
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