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बेलागंज में 34 साल का इतिहास बदलने की चुनौती- ‘लालटेन’ की वापसी या ‘नीतीश मॉडल’ की पहली जीत?

पिछले 34 वर्षों से यहां 'लालटेन' जल रही है। वहीं, JDU के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का विषय बन गई है।

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बिहार विधानसभा चुनाव में बेलागंज सीट एक ऐसा चुनावी अखाड़ा है, जहां एक पार्टी का दबदबा 3 दशक से अधिक समय से कायम है। यह सीट RJD के लिए उसके कोर वोट बैंक का गढ़ है, जहां पिछले 34 वर्षों से ‘लालटेन’ जल रही है। वहीं, JDU के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का विषय बन गई है, क्योंकि उसे यहां ‘नीतीश मॉडल’ (सुशासन और विकास) के बल पर पहली बार जीत दर्ज करने की चुनौती है।

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34 साल का ‘लालटेन’ दबदबा

बेलागंज सीट के इतिहास पर गौर करें तो यह सुरेंद्र प्रसाद यादव का गढ़ रहा है। यह सीट 1990 से लेकर 2020 तक लगातार राजद या उसके पूर्ववर्ती दल (जनता दल) के कब्जे में रही है, जिसमें सुरेंद्र प्रसाद यादव प्रमुख भूमिका में रहे हैं।

RJD का आधार

यह सीट यादव बहुल मानी जाती है और RJD के MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण का मजबूत किला है। सुरेंद्र प्रसाद यादव ने इस जनाधार को अपनी व्यक्तिगत पकड़ और यादव अस्मिता की राजनीति से अभेद्य बना दिया है।

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इस बार भी, सुरेंद्र प्रसाद यादव के मैदान में उतरने की प्रबल संभावना है, जो RJD की इस सीट पर पकड़ को और मजबूत करेगी।

JDU की चुनौती- ‘नीतीश मॉडल’ और अभय कुशवाहा

NDA की ओर से बेलागंज का किला फतह करने की जिम्मेदारी JDU के अभय कुशवाहा पर है। अभय कुशवाहा ने 2015 के चुनाव में भी RJD को कड़ी टक्कर दी थी, लेकिन जीत दर्ज नहीं कर पाए थे। JDU के लिए यह सिर्फ एक सीट जीतने का मामला नहीं है, बल्कि सुशासन और विकास (नीतीश मॉडल) की राजनीति से जातीय समीकरणों को तोड़ने और RJD के गढ़ में सेंध लगाने का बड़ा इम्तिहान है।

JDU की रणनीति

जदयू का जोर कुशवाहा (कोइरी) और अन्य अति-पिछड़ी जातियों (EBC) तथा सवर्ण वोटों को एकजुट करने पर होगा।

कुशवाहा वोट

अभय कुशवाहा के जरिए जदयू अपने मूल वोट बैंक (लव-कुश समीकरण-कुर्मी-कोइरी) को लामबंद करेगी।

EBC और महिला वोटर

नीतीश कुमार की योजनाओं (जैसे महिला सशक्तिकरण और EBC आरक्षण) का लाभ उठाकर ‘चुपचाप वोटर’ को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश होगी।

जातीय समीकरण-
बेलागंज की चाबी

बेलागंज में मुकाबला पूरी तरह से यादव वर्चस्व बनाम लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) + EBC + सवर्ण गठबंधन का है।

जातीय समूहरुझानसियासी महत्व
यादवराजद का कोर वोट बैंकबेलागंज में सबसे बड़ा और निर्णायक जातीय समूह।
मुस्लिमपारंपरिक रूप से राजद समर्थकMY समीकरण को मजबूत करते हैं।
कुशवाहा (कोइरी)JDU (अभय कुशवाहा) का आधारRJD के MY वोट बैंक को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं।
दलित (SC/EBC)नीतीश कुमार की योजनाओं से प्रभावितये वोट जिस ओर मुड़ते हैं, परिणाम बदल सकते हैं।
भूमिहार/अन्य सवर्णपारंपरिक रूप से NDA समर्थकJDU-NDA गठबंधन के लिए जीत सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण।
  • क्या एक जीत से बदलेगा 34 साल का इतिहास?
  • यह चुनाव बेलागंज की राजनीतिक दिशा तय करेगा।
  • अगर ‘लालटेन’ जीतती है…

यह साबित होगा कि बेलागंज में यादव-MY समीकरण की पकड़ अभी भी मजबूत है, और विकास की राजनीति यहां जातीय लामबंदी को भेद नहीं पाई है।

अगर ‘नीतीश मॉडल’ जीतता है…

यह JDU के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी, जो यह दर्शाएगी कि लव-कुश + EBC + सवर्ण गठबंधन ने दशकों पुराने जातीय समीकरणों के किले को ढहा दिया है। यह जीत पूरे मगध क्षेत्र में JDU के मनोबल को बढ़ाएगी।

बेलागंज सीट पर जीत-हार का अंतर कम रहने की संभावना है। यह एक ऐसी लड़ाई होगी, जिसमें पार्टी की नीतियां नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जनाधार, जातीय गोलबंदी और अंतिम समय के चुनावी प्रबंधन निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

Keywords: RJD Stronghold, Lalten/Lantern, Nitish Model, Political Challenge

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