अफ्रीका के इथियोपिया की दक्षिणी ओमो वैली में बसी हमर जनजाति आज भी आधुनिकता से काफी दूर है। करीब 40 हजार की आबादी वाला यह समुदाय अपनी पारंपरिक जीवनशैली, रंगीन परिधानों और विशिष्ट अनुष्ठानों के लिए प्रसिद्ध है। यहां का “बुल जंपिंग” समारोह युवाओं के वयस्क बनने का प्रतीक है, जबकि “गोटा रिवाज” महिलाओं की परीक्षा से जुड़ा है। मगर इन परंपराओं के बीच एक ऐसी प्रथा भी है जिसने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है, बीमारी का इलाज जानवरों की बलि और उनके पेट की गंध सूंघकर करना। यह सुनने में भले विचित्र लगे, लेकिन हमर जनजाति इसे सैकड़ों सालों से अपनाती आ रही है।
भेड़ के पेट से निकलता है इलाज
हमर समुदाय में जब कोई बीमार पड़ता है चाहे सर्दी-जुकाम हो या कोई रहस्यमयी रोग परिवार एक जानवर चुनता है, जैसे भेड़ या बकरी। उसे बलि चढ़ाने के बाद उसके पेट को सावधानी से फाड़ा जाता है। अंदर मौजूद अपचित घास, जड़ी-बूटियां और पाचन रसों की तेज गंध को मरीज गहराई से सूंघता है। उनका मानना है कि यह गंध शरीर के अंदर के रोगाणुओं को समाप्त करती है और आत्मा को शुद्ध करती है। यही नहीं, कुछ बुजुर्ग इस प्रक्रिया से भविष्यवाणी भी करते हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में दिखाया गया कि परिवार के लोग बारी-बारी से जानवर के पेट में मुंह डालकर उसकी गंध सूंघ रहे हैं।
जब पॉटी बनती है सुंदरता का राज़
हमर जनजाति में पशुओं की पॉटी भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। वे मानते हैं कि गाय या भेड़ की पॉटी में प्राकृतिक औषधीय तत्व होते हैं जो त्वचा को कीटों से बचाते हैं और धूप से सुरक्षा देते हैं। महिलाएं इसे बालों और त्वचा पर लगाती हैं ताकि रंग गहरा और त्वचा चमकदार दिखे। यह परंपरा सिर्फ हमर में नहीं, बल्कि पास की मुरसी ट्राइब में भी प्रचलित है, जहां गाय की पॉटी को प्राकृतिक सनस्क्रीन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आधुनिक सौंदर्य प्रसाधनों से दूर यह जनजाति प्रकृति को ही अपनी दवा, सौंदर्य और जीवन का आधार मानती है।
विज्ञान और परंपरा का टकराव
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो जानवरों द्वारा चराई गई कुछ जड़ी-बूटियों में एंटीबैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी तत्व पाए जाते हैं, जो मामूली राहत दे सकते हैं। लेकिन डॉक्टर इस विधि को खतरनाक बताते हैं क्योंकि इससे संक्रमण फैलने की संभावना बढ़ जाती है। जानवर के शरीर में मौजूद बैक्टीरिया सांस के जरिए मानव शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इसके बावजूद हमर समुदाय का मानना है कि यह प्रक्रिया न केवल शरीर बल्कि आत्मा को भी ठीक करती है। यह उनकी संस्कृति और विश्वास का हिस्सा है, जिसे वे चिकित्सा से अधिक “आध्यात्मिक शुद्धिकरण” मानते हैं।
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