पाकिस्तान सरकार ने अपने राज्यों में रह रहे अफगान नागरिकों के खिलाफ सख्त अभियान शुरू किया है। पंजाब में मियांवाली के कोट चांदना इलाके में मौजूद आखिरी अफगान शरणार्थी शिविर को भी बंद कर दिया गया है। यह शिविर कई सालों से अफगानिस्तान से आए लोगों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना था। पंजाब पुलिस के अनुसार, इस महीने करीब 22,000 अफगान नागरिकों को वापस भेजा गया है। इनमें से 6,000 लोगों के पास रहने के कागज़ थे, 11,000 के पास अफगान नागरिक कार्ड थे और करीब 5,000 लोग बिना किसी दस्तावेज के रह रहे थे।
तीसरे चरण में तेज हुई निर्वासन प्रक्रिया
पुलिस प्रवक्ता ने बताया कि यह अभियान अब तीसरे चरण में पहुंच गया है। इससे पहले अप्रैल से सितंबर के बीच पाकिस्तान की ‘Illegal Foreigners Repatriation Plan (IFRP)’ के तहत करीब 43,000 अफगान नागरिकों को वापस अफगानिस्तान भेजा जा चुका है। पंजाब में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे और सावधानी से की जा रही है, ताकि कोई भी अवैध निवासी बच न पाए। रिपोर्टों के मुताबिक, इस समय 423 लोगों को हिरासत में रखा गया है और उन्हें भी जल्द ही अफगानिस्तान भेजा जाएगा। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरे अभियान के दौरान सुरक्षा बलों को अलर्ट पर रखा गया है।
अन्य राज्यों में अब भी मौजूद हैं शरणार्थी शिविर
हालांकि पंजाब में आखिरी अफगान शरणार्थी शिविर बंद हो चुका है, लेकिन पाकिस्तान के बाकी राज्यों में अब भी कई शिविर चल रहे हैं। खैबर पख्तूनख्वा में 4 और बलूचिस्तान में 10 शिविर अभी सक्रिय हैं, जिनमें हजारों अफगान शरणार्थी रह रहे हैं। ये लोग कई सालों से पाकिस्तान में बसे हुए हैं। सरकार का कहना है कि आने वाले महीनों में इन इलाकों में भी कार्रवाई तेज की जाएगी। पाकिस्तान का तर्क है कि यह कदम देश की सुरक्षा और जनसंख्या नियंत्रण के लिए जरूरी है, क्योंकि बड़ी संख्या में अवैध रूप से रह रहे लोग संसाधनों पर दबाव डाल रहे हैं।
अफगान शरणार्थियों की लंबी दास्तान
अफगानिस्तान में 1979 से शुरू हुए गृहयुद्ध, तालिबान शासन और हाल की राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से लाखों अफगान नागरिक पाकिस्तान आ गए थे। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, एक समय पाकिस्तान में करीब 20 लाख अफगान शरणार्थी थे, जिनमें से अब तक लगभग 10–12 लाख को वापस भेजा जा चुका है। हालांकि, कई निर्वासित अफगानों का कहना है कि अब उनके पास अफगानिस्तान लौटने की कोई जगह या साधन नहीं है। पाकिस्तान की सख्त कार्रवाई से मानवीय संकट भी खड़ा हो गया है, क्योंकि बहुत से परिवार अब सीमा पार अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं, जहां ना तो खाना ठीक से मिल रहा है और ना ही सुरक्षा का भरोसा है।
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