बिहार की राजनीति में पटना साहिब विधानसभा क्षेत्र का एक खास स्थान है। यह महज़ एक चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक प्रतीक है। ऐतिहासिक गुरुद्वारा, गंगा किनारे बसी यह विधानसभा सीट BJP का गढ़ मानी जाती रही है, लेकिन 2025 के चुनावों में बदलते राजनीतिक समीकरण और सामाजिक जातीय गुटबाज़ी ने पटना साहिब को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।
इस बार की लड़ाई सिर्फ चेहरों की नहीं, बल्कि सियासी पकड़ बनाम सामाजिक समीकरण की भी है।
इतिहास की झलक
शत्रुघ्न सिन्हा से लेकर नंदकिशोर यादव तक
पटना साहिब का राजनीतिक इतिहास फिल्मी सितारों और दिग्गज नेताओं से भरा रहा है। 2009 और 2014 में लोकसभा चुनाव में शत्रुघ्न सिन्हा ने BJP के टिकट पर भारी बहुमत से जीत दर्ज की थी, हालांकि बाद में उन्होंने पार्टी बदलकर कांग्रेस का दामन थाम लिया। विधानसभा स्तर पर नंदकिशोर यादव जैसे वरिष्ठ नेता यहां से कई बार विधायक रहे हैं, जिनकी पहचान कुशल वक्ता और सुलझे नेता के रूप में रही है। लेकिन वक्त के साथ यहां की राजनीति में नए चेहरे और नए समीकरणों की एंट्री हो चुकी है।
प्रमुख सियासी समीकरण
BJP का वर्चस्व
यह सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई (पहले पटना ईस्ट कहलाती थी)। तब से लेकर 2020 तक लगातार नंद किशोर यादव इस सीट पर विधायक रहे, जो BJP के लिए इस क्षेत्र की अजेयता को दर्शाते हैं।
शहरी/सवर्ण प्रभुत्व
पटना साहिब एक शहरी और अर्ध-शहरी निर्वाचन क्षेत्र है, जहां उच्च जातियों (सवर्ण), खासकर कायस्थ मतदाताओं की संख्या का प्रभाव अधिक माना जाता है। यह जातीय समीकरण पारंपरिक रूप से भाजपा के पक्ष में रहा है, जिससे यह भगवा दल का कोर गढ़ बन गया है।
विकास बनाम जाति
यहां चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों, शहरी विकास और भाजपा के कोर एजेंडे पर लड़ा जाता है। महागठबंधन (RJD+INC) के लिए यहाँ अपने MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण या OBC/EBC की लामबंदी के जरिए सेंध लगाना बेहद मुश्किल रहा है।
2025 चुनाव में बड़ा बदलाव
आगामी विधानसभा चुनाव (2025) में इस सीट पर एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ है
BJP ने अपने दिग्गज और निवर्तमान विधानसभा अध्यक्ष नंद किशोर यादव का टिकट काट दिया है। उनके स्थान पर, पार्टी ने रतनेश कुशवाहा को उम्मीदवार बनाया है।
जातीय दांव
नंद किशोर यादव को हटाकर एक कुशवाहा चेहरे को मैदान में उतारना भाजपा की ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) और EBC (अति-पिछड़ी जाति) वोटों को साधने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
इससे BJP को उन सीटों पर कुशवाहा वोट बैंक को साधने में मदद मिल सकती है जहां JDU या उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी (RLM) कमजोर हैं। यह देखना होगा कि नंद किशोर यादव के समर्थक और यादव समुदाय का एक बड़ा वर्ग इस बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया देता है, हालांकि पटना जैसे शहरी क्षेत्र में पार्टी के प्रति वफादारी अक्सर उम्मीदवार की जाति से ऊपर होती है।
पिछले चुनाव परिणाम (संक्षेप में)
- वर्ष विजेता उम्मीदवार पार्टी प्राप्त वोट (%) उपविजेता उम्मीदवार पार्टी जीत का अंतर
- 2020 नंद किशोर यादव BJP 51.91% प्रवीण सिंह INC 18,300
- 2015 नंद किशोर यादव BJP 46.89% संतोष मेहता RJD 2,792
- 2010 नंद किशोर यादव BJP 68.07% परवेज़ अहमद INC 65,337
चुनावी रुझान
कम वोटिंग प्रतिशत शहरी सीट होने के कारण यहां मतदान प्रतिशत अक्सर कम रहता है (2020 में लगभग 52.23%), जो आमतौर पर सत्ताधारी दल के लिए फायदेमंद होता है।
महागठबंधन की चुनौती
2015 में RJD उम्मीदवार ने BJP को कड़ी टक्कर दी थी (अंतर मात्र 2,792 वोटों का था), लेकिन 2020 में BJP ने अपनी बढ़त फिर से बढ़ा ली। महागठबंधन को यदि यह सीट जीतनी है, तो उन्हें सवर्ण/शहरी गैर-BJP वोटों के साथ-साथ यादव-मुस्लिम वोटों को बड़े पैमाने पर एकजुट करना होगा।
पटना साहिब सीट BJP का सुरक्षित गढ़ बनी हुई है, लेकिन दिग्गज नेता का टिकट काटने और नए कुशवाहा चेहरे को मैदान में उतारने का दांव, BJP की अपनी कोर रणनीति को व्यापक EBC समीकरणों से जोड़ने का प्रयास है। महागठबंधन के लिए यहाँ जीत दर्ज करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी।
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