लोकसभा में विपक्षी दलों ने स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंप दिया। 118 सांसदों के दस्तखत हैं इस नोटिस पर, इनमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, वाम दल, आरजेडी समेत लगभग सारे बड़े विपक्षी दल शामिल हैं। लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने खुद को इससे अलग रखा, जिससे विपक्ष का एकजुट मोर्चा थोड़ा कमजोर दिखा। कांग्रेस सांसद सुरेश कोडिकुन्निल, गौरव गोगोई और मोहम्मद जावेद खुद नोटिस लेकर महासचिव के ऑफिस पहुंचे। ये सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि विपक्ष ने सरकार और स्पीकर दोनों को साफ सियासी संदेश दे दिया है, अब सदन के संचालन पर असहमति खुलकर चुनौती में बदल चुकी है।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा का बयान
विपक्ष खुलकर कह रहा है कि स्पीकर ने निष्पक्षता नहीं रखी, बार-बार सत्ता पक्ष के हक में फैसले लिए, और विपक्ष की आवाज़ दबाई। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने तो साफ कहा कि स्पीकर सरकार के दबाव में आ गए और उन्हें सफाई देनी पड़ी, जो कि संसदीय परंपरा के खिलाफ है। विपक्ष मानता है कि उन्हें सवाल पूछने और चर्चा की इजाजत नहीं दी गई, जिससे लोकतंत्र को झटका लगा है। सरकार ने इन आरोपों को सीधा नकार दिया और कहा, स्पीकर तो संविधान के हिसाब से ही फैसले लेते हैं, विपक्ष बेवजह विवाद खड़ा कर रहा है।
स्पीकर को हटाने का तरीका
लोकसभा स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 94 और लोकसभा नियम 200 के मुताबिक तय होती है। किसी भी सांसद को महासचिव को लिखित प्रस्ताव देना होता है, जिसमें आरोप बिलकुल साफ और तथ्यात्मक हों न तो तंज, न अंदाजे, न अपमानजनक भाषा। नोटिस मिलते ही उसे कार्यसूची में डाल दिया जाता है, और कम से कम 14 दिन बाद उस पर चर्चा होती है। प्रस्ताव के लिए कम-से-कम 50 सांसदों का समर्थन होना जरूरी है। इस चर्चा और वोटिंग के वक्त स्पीकर या डिप्टी स्पीकर अध्यक्षता नहीं करते। प्रस्ताव तभी पास होगा, जब लोकसभा के मौजूदा सदस्यों का बहुमत इसके हक में वोट दे।
बहुमत का खेल और प्रस्ताव का अंजाम
अगर सीधे-सीधे देखें तो विपक्ष के पास प्रस्ताव लाने की संख्या तो है, मगर उसे पास करवाना मुश्किल है। एनडीए के पास लोकसभा में मजबूत बहुमत है, ऐसे में सरकार के खिलाफ कोई भी अविश्वास या हटाने का प्रस्ताव कामयाब होना मुश्किल है। जानकार कहते हैं, विपक्ष का असली मकसद सरकार पर दबाव बनाना, सदन के संचालन पर बहस को जनता के सामने लाना और आगे की सियासत के लिए माहौल तैयार करना है। हो सकता है ये प्रस्ताव पास न हो, लेकिन संसद के भीतर और बाहर सियासी माहौल जरूर गरमा जाएगा।
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