हमारे देश में कथित जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव के मामले बहुत बार सामने आते रहते हैं, और ये घटनाएँ साफ़ बताती हैं कि आज भी हमारे समाज में जाति को लेकर कितना ज़्यादा भेदभाव फैला हुआ है। ऐसी बुरी खबरें जब आती हैं तो कुछ समय के लिए बड़ी-बड़ी चर्चाएँ शुरू हो जाती हैं, लेकिन ये बातें किसी भी नतीजे तक नहीं पहुँच पाती हैं और मामला शांत हो जाता है।
बड़े अफ़सर पर भी ज़ुल्म का आरोप
हाल ही में हरियाणा कैडर के आईपीएस अधिकारी वाई. पूरन कुमार ने चंडीगढ़ में अपने घर पर खुदकुशी कर ली, जिसे संस्थागत (किसी सरकारी या निजी दफ्तर के अंदर) जातिगत उत्पीड़न का एक बहुत दुखद उदाहरण बताया जा रहा है। उन्होंने अपने सुसाइड नोट में पंद्रह बड़े अफ़सरों पर उन्हें मानसिक तनाव देने और जातिगत भेदभाव करने का बहुत गंभीर आरोप लगाया है, और ऐसी बड़ी घटना में स्वाभाविक है कि राजनीतिक रंग भी आ गया है।
इसी तरह, मध्य प्रदेश के दमोह ज़िले में भी एक ऐसी ही शर्मनाक घटना पर बहुत चर्चा हो रही है। बताया गया है कि वहाँ एक अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के युवक को जबरदस्ती एक ब्राह्मण व्यक्ति का पैर धोकर उसका पानी पीने के लिए कहा गया। इस पूरी घटना का वीडियो जब सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैल गया, तो कई सामाजिक संगठनों ने उस जगह पर बड़ा विरोध प्रदर्शन किया।
सदियों बाद भी क्यों नहीं बदले हालात?
यह दोनों घटनाएँ कोई नई या अलग बात नहीं हैं, क्योंकि अक्सर बड़े दफ्तरों और छोटे-छोटे गाँवों से भी कथित जातिगत उत्पीड़न की खबरें लगातार आती रहती हैं। जब तक यह मामले शांत नहीं होते, तब तक बस यही चर्चा होती है कि भारत के समाज में आज भी जातिवाद अपनी गहरी जड़ें जमाए हुए है।
उत्पीड़न की चर्चा करने वाले लोग कुछ जातियों को बुरा बताकर या “सदियों से चले आ रहे जातिगत ज़ुल्म” की बात कहकर आगे बढ़ जाते हैं, पर वे यह सबसे ज़रूरी सवाल कभी नहीं उठाते कि पिछले सौ से डेढ़ सौ सालों से इसी तरह की बातें होने के बावजूद, और हमारे संविधान में भेदभाव को खत्म करने के लिए साफ़ और कड़े नियम होने के बाद भी, और साढ़े तीन दशक से “सामाजिक न्याय” की राजनीति देश पर हावी रहने के बावजूद, ज़मीन पर हालात क्यों नहीं बदले हैं।
जाति पर केंद्रित चर्चा का नुक़सान
यह ऐसे सवाल हैं जो पूछने में बहुत कठिन लगते हैं और सही जवाब न मिलने पर परेशानी बढ़ाते हैं। जब हम इन सवालों की गहराई में जाकर देखते हैं, तो पता चलता है कि “सामाजिक न्याय” की बात करने वाले लोगों ने खुद जातिगत पहचान और कौन किस जाति का है, इसी को सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा और अकेला ज़रिया बना दिया है।
इस वजह से समाज में सारी बातचीत बस जातिवाद और जाति के मुद्दों पर ही टिकी रह गई है। इसका सबसे बड़ा नुक़सान यह हुआ है कि जिन समूहों को उनका सही हक़ नहीं मिल पाया है, उनके बीच बड़ी एकता बनने की संभावनाएँ बहुत कम हो गई हैं, और समाज के आधुनिक बनने की संभावनाएँ भी कम हो गई हैं। इसका नतीजा यह निकला है कि “जाति को पूरी तरह खत्म करने” का जो बड़ा लक्ष्य लेकर आधुनिक भारत को बनाने का काम शुरू हुआ था, वह पीछे छूट गया है। इससे कुछ नेताओं के परिवारों और अच्छी पढ़ाई-लिखाई वाले मध्यम वर्ग के लोगों को तो फ़ायदा ज़रूर हुआ है, लेकिन जातिवाद को या ज़मीन पर हो रहे जातिगत भेदभाव को पूरी तरह से खत्म करने का रास्ता और भी ज़्यादा मुश्किल हो गया है।
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