अमेरिका की मौसम एजेंसी NOAA के विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल अटलांटिक महासागर में बनने वाले तूफानों की गतिविधि सामान्य से कम रह सकती है। इसके पीछे प्रमुख वजह अल नीनो की स्थिति को माना जा रहा है। एजेंसी के अनुसार, इस सीजन में तूफानी गतिविधियां सामान्य से कम रहने की संभावना 55 प्रतिशत है, जबकि सामान्य से अधिक सक्रिय रहने की संभावना केवल 10 प्रतिशत आंकी गई है।
हर साल अटलांटिक तूफान सीजन 1 जून से शुरू होकर 30 नवंबर तक चलता है और आमतौर पर सितंबर के आसपास इसकी तीव्रता सबसे ज्यादा होती है। अल नीनो एक ऐसी जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों का समुद्री तापमान बढ़ जाता है। इसका असर वैश्विक मौसम चक्र पर पड़ता है, जिससे कई क्षेत्रों में भारी बारिश, सूखा, लू और अन्य चरम मौसमी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके सक्रिय होने पर दुनिया के औसत तापमान में भी बढ़ोतरी देखने को मिलती है।
अल नीनो कैसे बदलता है मौसम का मिजाज?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जो कुछ वर्षों के अंतराल पर विकसित होती है और कई महीनों तक प्रभावी रह सकती है। इस दौरान प्रशांत महासागर के बड़े हिस्से में समुद्र का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, जिससे दुनिया भर के मौसम पैटर्न प्रभावित होते हैं। तापमान में यह बदलाव हवाओं की गति और दिशा को भी प्रभावित करता है, जिसके कारण वर्षा, सूखा और तूफानों के स्वरूप में बदलाव देखने को मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो के प्रभाव से अटलांटिक क्षेत्र में तूफानों की संख्या घट सकती है, जबकि प्रशांत क्षेत्र में चक्रवाती गतिविधियां बढ़ने की संभावना रहती है।
दुनियाभर में दिखता है असर
अल नीनो का प्रभाव केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह वैश्विक मौसम व्यवस्था को प्रभावित करता है। इसके कारण कई देशों में तापमान सामान्य से अधिक हो सकता है और मौसम की चरम घटनाएं बढ़ सकती हैं। भारत, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका के कुछ हिस्सों और दक्षिण अमेरिका में सूखे, गर्म हवाओं और जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ने की आशंका रहती है। वहीं, अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो के सक्रिय होने पर दुनिया के कई हिस्सों में मौसम का संतुलन बिगड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों बढ़ती है चिंता?
अल नीनो का असर भारत के मौसम और कृषि क्षेत्र पर सबसे ज्यादा देखने को मिल सकता है। इसके प्रभाव से गर्मी का दौर लंबा खिंच सकता है और मानसून की बारिश प्रभावित हो सकती है। यदि वर्षा सामान्य से कम होती है, तो जल संसाधनों पर दबाव बढ़ने के साथ-साथ खेती-किसानी को भी नुकसान पहुंच सकता है। इससे अनाज, सब्जियों और अन्य खाद्य पदार्थों की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका रहती है, जिसका असर बाजार कीमतों पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के बीच अल नीनो की स्थिति भारत की मौसम संबंधी चुनौतियों को और बढ़ा सकती है।
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