महाराष्ट्र के हालिया स्थानीय निकाय चुनावों ने ये बात एकदम खुलकर सामने रख दी है कि आज की तारीख में राज्य की राजनीति पूरी तरह बीजेपी के इर्द-गिर्द घूम रही है। 288 में से 207 सीटें जीतकर बीजेपी के नेतृत्व वाली महायुति ने न सिर्फ अपना दम दिखाया, बल्कि विपक्ष की रणनीति और एकजुटता पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। बीजेपी ने अकेले 117 सीटें अपने नाम कीं नगर निकाय चुनावों में ये उसका अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है।
दूसरी तरफ, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) सिर्फ नौ सीटें जीत पाई। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 53 सीटें मिलीं, जिससे साफ दिख रहा है कि शिवसेना का पारंपरिक वोट बैंक अब काफी हद तक बीजेपी के साथ जा चुका है। शरद पवार की एनसीपी को भी कोई खास फायदा नहीं हुआ उन्हें सिर्फ सात सीटें मिलीं, जबकि अजित पवार के गुट ने 37 सीटें अपने नाम कीं।
बीजेपी की बगावत
अगर सिर्फ विपक्ष की हार पर फोकस करें तो बात अधूरी रह जाएगी। असली कहानी ये है कि महायुति के अंदर भी बीजेपी ने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है। शिंदे और अजित पवार ने भले ही बगावत कर बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाया, लेकिन चुनाव के नतीजे बताते हैं कि बीजेपी ने उन्हें कभी बराबरी का साथी नहीं बनने दिया। शहरी इलाकों में बीजेपी का वोट शेयर 11% से सीधे 30% तक पहुंच गया। आने वाले बीएमसी चुनावों के लिए ये काफी अहम है। रिपोर्ट्स कि माने तो, इन नतीजों से बीजेपी की पकड़ अर्ध-शहरी और ग्रामीण इलाकों में भी मजबूत होगी, जिससे 2029 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तैयारी पहले से ही मजबूत हो गई है।
ठाकरे-पवार के लिए बीएमसी चुनाव है आखिरी मौका
बीएमसी चुनाव अब उद्धव ठाकरे और शरद पवार, दोनों के लिए निर्णायक मोड़ बन गया है। हाल ही में उद्धव और राज ठाकरे की 20 साल बाद हुई सियासी नजदीकी को बड़ी चाल मानी जा रही है। खबर है कि बीएमसी चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) 157 और मनसे 70 सीटों पर लड़ सकती है। अगर यह गठजोड़ बनता है, तो ठाकरे परिवार के लिए यह ऐतिहासिक मौका होगा। लेकिन इस खेल में शरद पवार की एनसीपी को सिर्फ 15 सीटें मिलने की बात चल रही है, जो उनके लिहाज से बहुत कम है। अगर ये हार की हैट्रिक लगती है, तो ठाकरे और पवार दोनों की राजनीतिक विरासत को बड़ा झटका लग सकता है।
कांग्रेस अलग राह पर, एमवीए में दरारें
इन सबके बीच, कांग्रेस खुद को किनारे महसूस कर रही है। उसने साफ कर दिया है कि बीएमसी चुनाव अकेले लड़ेगी। शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं ने कांग्रेस को ‘मुंबई की राजनीति में अप्रासंगिक’ तक कह दिया है, जिससे महा विकास आघाड़ी (एमवीए) के अंदर की दरारें और गहरी हो गई हैं। कांग्रेस कह रही है कि वो ऐसी किसी भी राजनीति के खिलाफ है, जो भाषा, जाति या धर्म के नाम पर बांटती है। लेकिन असली सवाल यही है, क्या बिखरे हुए विपक्ष के सामने बीजेपी की संगठित और आक्रामक रणनीति टिक पाएगी? अभी के चुनाव नतीजे तो यही बता रहे हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है।
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