भारत में आजकल दिल की बीमारी, शुगर (डायबिटीज) और साँस की गंभीर समस्याओं (NCDs) का खतरा बहुत तेज़ी से बढ़ गया है, जिसने देश की सेहत से जुड़ी चुनौतियों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। साल 2017 में सरकार ने भी इस बड़े बदलाव को समझा था और इन बीमारियों पर ध्यान देने के लिए एक नई स्वास्थ्य नीति बनाई थी, लेकिन हाल ही में आई ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज’ (GBD) की एक नई रिपोर्ट यह दिखाती है कि यह खतरा पिछले आठ सालों में और भी ज़्यादा साफ हो गया है। यह रिपोर्ट साफ-साफ बता रही है कि हमें एक ऐसी स्वास्थ्य नीति की तुरंत ज़रूरत है जो खराब खान-पान, कम काम करने वाली जीवनशैली और तेज़ी से बढ़ रहे प्रदूषण के बुरे असर को ठीक से पहचान सके।
गंभीर बीमारियों से कम उम्र में जा रही हैं जानें
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सरकारी आंकड़े हमें बताते हैं कि भारत में अब लगभग 65 प्रतिशत मौतें इन्हीं गैर-संक्रामक बीमारियों (NCDs) के कारण हो रही हैं। इससे भी ज़्यादा फिक्र की बात यह है कि इन बीमारियों से मरने वाले लगभग एक-चौथाई (यानी 25 प्रतिशत) लोगों की उम्र 70 साल से कम होती है। अगर हम दूसरे देशों से इसकी तुलना करें तो, अमेरिका में यह आंकड़ा लगभग 12 प्रतिशत और चीन में 17 प्रतिशत है, जो भारत से काफी कम है। इसका साफ मतलब यह है कि भारत में दिल की बीमारी, शुगर (डायबिटीज), और फेफड़ों की बीमारियाँ एक बहुत बड़े समूह की ज़िन्दगी को समय से पहले खत्म कर रही हैं, जिससे उनके परिवार, समाज और देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँच रहा है।
साँस की अनदेखी होती हुई बड़ी बीमारी: सीओपीडी
इस रिपोर्ट में सीओपीडी (क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) जैसी साँस की बीमारी पर भी खास तौर पर ध्यान दिया गया है, जो भारत में साँस से जुड़ी कुल बीमारियों के बोझ का 75 प्रतिशत से भी ज़्यादा है। सीओपीडी एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई पक्का इलाज तो नहीं है, लेकिन सही समय पर इसका इलाज शुरू कर दिया जाए तो मरीज के जीवन की क्वालिटी बहुत अच्छी हो सकती है। लेकिन एक बड़ी संख्या में मरीजों को इस बीमारी का सही पता ही नहीं चल पाता है, क्योंकि डॉक्टर अक्सर इसके असली कारण के बजाए केवल खाँसी, सर्दी और बुखार जैसे लक्षणों को ही देखते हैं। यह हालत हमारी बेसिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की एक बहुत बड़ी कमी को दिखाती है।
बीमारी को रोकने के लिए एक बड़ा नजरिया जरूरी है
हमारे देश को अब एक ऐसे तरीके की ज़रूरत है जो बीमारियों के इलाज के साथ-साथ सही खाने-पीने और पर्यावरण को समझने पर भी ध्यान दे। केवल नए अस्पताल बनाना ही काफी नहीं है, हमें यह पक्का करना होगा कि बीमारी हो ही ना। यह सुनिश्चित करने के लिए कि लोग अपनी सेहत के लिए अच्छे रास्ते चुनें, हमें स्कूलों, परिवारों और पूरे समाज के ज़रिए बच्चों को कम उम्र से ही इसके लिए तैयार करना होगा, जिसमें अच्छा खाना खाने की आदतें, शरीर को पूरी तरह से एक्टिव रखना और अपने आस-पास के माहौल को साफ रखने की शिक्षा देना भी शामिल है। पर्यावरण को ठीक करने वाली परियोजनाओं और लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने वाली योजनाओं के बीच एक तालमेल बनाना अब ऐसी ज़रूरत है जिसे हम बिलकुल भी टाल नहीं सकते हैं।
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