भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित “Berlin Global Dialogue” कार्यक्रम में स्पष्ट कहा कि भारत किसी भी देश के साथ जल्दबाजी में या दबाव में आकर व्यापार समझौते नहीं करेगा।
उन्होंने कहा कि भारत जल्दबाजी में कोई व्यापार समझौता नहीं करेगा। हम किसी सौदे पर ‘बंदूक की नोंक पर’ हस्ताक्षर नहीं करेंगे। गोयल ने कहा कि भारत की व्यापार नीति पूरी तरह से राष्ट्रीय हित, पारदर्शिता और पारस्परिक सम्मान पर आधारित है। कोई भी समझौता तभी होगा जब वह भारत के लोगों और उद्योगों के लिए दीर्घकालिक रूप से लाभदायक साबित होगा।
भारत-अमेरिका ट्रेड को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाना लक्ष्य
भारत इन दिनों कई देशों के साथ बड़े व्यापार समझौते कर रहा है, जिनमें यूरोपीय संघ (EU) और संयुक्त राज्य अमेरिका (US) प्रमुख हैं। इन वार्ताओं में बाजार तक पहुंच, पर्यावरणीय मानक और आयात शुल्क जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। अमेरिका के साथ बातचीत का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक भारत-अमेरिका व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाया जाए, जो फिलहाल लगभग 191 अरब डॉलर है।
राष्ट्रीय हित सर्वोपरि- पीयूष गोयल
गोयल ने कहा कि समयसीमा और डेडलाइन वार्ता को दिशा देने के लिए जरूरी हैं, लेकिन देश के हित से बढ़कर कुछ नहीं।समयसीमाएं हमें तेजी से बात करने को प्रेरित करती हैं, लेकिन जब तक देश और जनता के हित सुरक्षित नहीं होते, तब तक जल्दबाजी करना सही नहीं।
उन्होंने कहा कि भारत ऐसे साझेदारों की तलाश में है जो आपसी विश्वास और निष्पक्षता पर आधारित संबंध चाहते हैं। न कि दबाव डालकर या अनुचित शर्तों के साथ समझौते करें।
हालांकि भारत अपने हितों की रक्षा पर अडिग है, लेकिन अमेरिका, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन जैसे देशों की ओर से दबाव बना हुआ है। इन देशों ने भारत द्वारा रियायती रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर आपत्तियां जताई हैं। वहीं, यूरोपीय संघ भारत पर पर्यावरण और उत्पाद मानकों को लेकर सख्त शर्तें लगा रहा है, जिन्हें भारत अनुचित और अव्यवहारिक मानता है।
2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य- मंत्री
पीयूष गोयल ने कहा कि भारत केवल वही व्यापारिक समझौते करेगा जो परस्पर लाभकारी हों। उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य है 2047 तक ‘विकसित भारत’ का निर्माण, और इसके लिए कोई भी निर्णय जल्दबाजी में नहीं लिया जाएगा।
इस दौरान पीयूष गोयल ने ये साफ कहा कि हम सहयोग चाहते हैं, समझौता नहीं, साझेदारी चाहते हैं, दबाव नहीं। भारत और उसके साझेदार देशों के बीच अभी कई मुद्दों पर मतभेद हैं जैसे सेवा क्षेत्र में उदारीकरण, शुल्क नीति, उत्पत्ति नियम और जलवायु-संबंधी व्यापार प्रावधान।
अब देखना दिलचस्प होगा कि भारत की यह सख्त नीति इन वार्ताओं को किस दिशा में ले जाती है। सफल समझौते की ओर या लंबी बातचीत की ओर।
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