भारत के ऑपरेशन ‘सिंदूर’ ने पाकिस्तान में चल रहे आतंकी संगठनों को बड़ा झटका दिया था। इस ऑपरेशन में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों के कई ठिकाने पूरी तरह तबाह कर दिए गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारतीय मिसाइल हमलों में पाकिस्तान के 9 बड़े आतंकी कैंप नष्ट हुए और करीब 100 आतंकवादी मारे गए। इस हमले के बाद से पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठन खुद को बचाने और फिर से संगठित होने की कोशिश कर रहे हैं।
अब लश्कर-ए-तैयबा ने अपनी ताकत और मौजूदगी दिखाने के लिए एक बड़ी रैली का ऐलान किया है। यह रैली 2 नवंबर को लाहौर के मीनार-ए-पाकिस्तान मैदान में आयोजित होगी। इस कार्यक्रम को आतंकी संगठन के फिर से उठ खड़े होने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियां इस पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यह रैली आगे किसी बड़े प्लान का हिस्सा हो सकती है।
लश्कर की रैली से दिखेगी ‘ताकत’
लश्कर-ए-तैयबा ने 2 नवंबर को लाहौर में होने वाली रैली के ज़रिए यह दिखाने की कोशिश की है कि भारत के ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के बाद भी वह कमजोर नहीं हुआ है। इस रैली को संगठन की दोबारा वापसी और पुनर्गठन के तौर पर देखा जा रहा है। रैली के पोस्टरों में ‘पहलगाम हमले’ में शामिल आतंकी सैफुल्ला कसूरी को नए चेहरे के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। वहीं, लश्कर के संस्थापक हाफिज सईद का एक संदेश भी इस रैली में पढ़ा जाएगा, जो फिलहाल पाकिस्तान की जेल में बंद है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह रैली केवल दिखावे के लिए नहीं है, बल्कि इसका असली मकसद पाकिस्तान में बिखरे आतंकी और कट्टरपंथी तत्वों को फिर से इकट्ठा करना है। भारतीय खुफिया एजेंसियां इस रैली पर करीबी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इसमें भारत के वांटेड कई आतंकियों के मौजूद रहने की आशंका है। इस रैली को लश्कर की एक नई चाल माना जा रहा है, जो आने वाले समय में किसी बड़े आतंकी प्लान की ओर इशारा कर सकती है।
पाकिस्तानी सेना की ‘छुपी योजना’
सूत्रों के अनुसार, लश्कर-ए-तैयबा की यह रैली पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और सेना की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि पाक सेना लश्कर के लड़ाकों का इस्तेमाल सिर्फ भारत के खिलाफ नहीं, बल्कि देश में बढ़ती तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की चुनौती से निपटने के लिए भी करना चाहती है। खासकर खैबर पख्तूनख्वा में TTP के प्रभाव बढ़ने से सेना चिंतित है, इसलिए वह लश्कर के लोगों को अपने सहायक बल के रूप में तैनात करने पर विचार कर रही है।
इस रैली को लश्कर-ए-तैयबा के राजनीतिक समेकन के रूप में दिखाने के लिए Pakistan Markazi Muslim League (PMML) के बैनर तले आयोजित किया जा रहा है। इसका मकसद इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक “राजनीतिक कार्यक्रम” बताकर आतंकवादी गतिविधियों से ध्यान हटाना है। सरल शब्दों में, रैली केवल ताकत दिखाने का मंच नहीं है, यह कई गहरे राजनीतिक और सैन्य इरादों का हिस्सा भी हो सकती है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा परिस्थितियों पर असर पड़ने का खतरा बनता है।
भारत की सतर्क नजर
भारतीय खुफिया एजेंसियां इस रैली की हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। सुरक्षा एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह रैली पाकिस्तान की ओर से अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करने और अपने आतंकी नेटवर्क को फिर से मजबूत करने का तरीका हो सकती है। अगर लश्कर-ए-तैयबा की यह रैली सफल होती है, तो यह पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों के पुनर्जीवन का संकेत होगा। भारत पहले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की दोहरी नीति पर सवाल उठा चुका है, जहां एक तरफ आतंकवाद के खिलाफ बातें की जाती हैं और दूसरी तरफ आतंकियों को संरक्षण दिया जाता है। अब यह देखना बाकी है कि 2 नवंबर को होने वाली यह रैली पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक राजनीतिक खेल है या फिर इससे आतंकी नेटवर्क को नई ताकत मिलती है। इस घटना पर भारत की नजर बनी हुई है क्योंकि इससे क्षेत्रीय सुरक्षा की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
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