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सूर्यगढ़ा का सियासी रण… विधायक पर टिकी निगाहें, क्या RJD की चौखट पर लौटेंगे प्रहलाद?

लखीसराय जिले की सूर्यगढ़ा विधानसभा सीट उन्हीं में से एक है। मुंगेर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा यह सीट इस बार एक दिलचस्प और अनिश्चित मुकाबले के केंद्र में है।

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बिहार की राजनीति में कई सीटें ऐसी होती हैं, जो सिर्फ चुनावी समीकरणों से नहीं, बल्कि नेताओं की व्यक्तिगत चालों और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से भी सुर्खियों में रहती हैं। लखीसराय जिले की सूर्यगढ़ा विधानसभा सीट उन्हीं में से एक है। मुंगेर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा यह सीट इस बार एक दिलचस्प और अनिश्चित मुकाबले के केंद्र में है।

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इतिहास से वर्तमान तक एक अनसुलझा पेंच

सूर्यगढ़ा का इतिहास जितना पुराना है, इसकी सियासी गांठ उतनी ही उलझी हुई। यह वही धरती है जहां 1534 में शेरशाह सूरी और हुमायूं के बीच ‘सूरजगढ़ा का युद्ध’ हुआ था। आज इस ऐतिहासिक जमीन पर 2 प्रमुख सहयोगी दल- BJP और JDU के बीच वर्चस्व की नई जंग छिड़ी है।
दिलचस्प बात यह है कि जेडीयू यहां आज तक खाता नहीं खोल पाई है। वहीं, बीजेपी ने 2005 और 2010 में प्रेम रंजन पटेल के नेतृत्व में 2 बार जीत का स्वाद चखा। लेकिन इस बार का पूरा सियासी माहौल मौजूदा विधायक प्रहलाद यादव के इर्द-गिर्द घूम रहा है।

बागी विधायक और सीटों की खींचतान

प्रहलाद यादव एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने सूर्यगढ़ा से कुल 5 बार विधायक का कार्यकाल पूरा किया है, जो इस क्षेत्र में उनके कद को दर्शाता है। 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने RJD के टिकट पर जीत हासिल की, लेकिन बाद में बागी होकर NDA की सरकार बनाने में मदद की।

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अब, जबकि JDU और BJP के बीच इस सीट पर खुलकर तनातनी चल रही है, कयास लगाए जा रहे हैं कि कहीं यह खींचतान प्रहलाद यादव को फिर से उनकी पुरानी पार्टी आरजेडी में न धकेल दे। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि आरजेडी भी शायद इसी मौके के इंतजार में है। सीट बंटवारे की इस रस्साकशी के बीच प्रहलाद यादव की अगली चाल ही सूर्यगढ़ा का भविष्य तय करेगी।

सहानुभूति और जातीय समीकरण का दांव

चुनाव में प्रहलाद यादव के पक्ष में एक मजबूत मानवीय पहलू भी काम कर सकता है। हाल ही में उनके बेटे का निधन हुआ है, जिससे उन्हें सहानुभूति वोटों का लाभ मिलने की संभावना है।

जातीय समीकरणों की बात करें तो सूर्यगढ़ा पूरी तरह से एक ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र है। यहां कुल 3,62,004 (2024 के अनुसार) मतदाता हैं, जिनमें यादव समुदाय का प्रभाव सर्वाधिक है। 25% से अधिक आबादी वाले यादव वोटर यहाँ निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, 14.77% अनुसूचित जाति और 3.5% मुस्लिम वोटर भी परिणाम को प्रभावित करते हैं।

जन सुराज की दस्तक

इस चुनावी बिसात पर एक नया मोहरा भी सामने आया है। प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाले जन सुराज ने अमित सागर को अपना उम्मीदवार बनाकर मुकाबले को और त्रिकोणीय बना दिया है। 1990 तक कांग्रेस और णझघ के दबदबे वाली यह सीट, जहां 2020 में 56.04% वोटिंग हुई थी, इस बार किसके पाले में जाएगी? क्या बीजेपी-जेडीयू की तनातनी प्रहलाद यादव को वापस आरजेडी में ले जाएगी? या फिर सहानुभूति, जातीय समीकरण और जन सुराज का नया दांव इस ऐतिहासिक सीट पर कोई चौंकाने वाला परिणाम देगा?

सूर्यगढ़ा का सियासी पारा चढ़ चुका है। ‘सूरजगढ़ा के युद्ध’ की तरह ही, इस बार का मुकाबला भी निर्णायक होने वाला है।

Keywords: Suryagarha Assembly Seat, Bihar Assembly Elections, Prahlad Yadav

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