हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसी कई फिल्में बनीं जिन्होंने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। कुछ ने अपार सफलता हासिल की, तो कुछ बॉक्स ऑफिस पर उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं। लेकिन एक फिल्म ऐसी भी बनी, जिसे लोग आज तक मनहूस फिल्म कहते हैं और वो फिल्म है ‘लव एंड गॉड।
24 साल में बनी फिल्म
यह फिल्म न सिर्फ अपनी कहानी के लिए, बल्कि अपने निर्माण से जुड़े दुखद घटनाओं के लिए याद की जाती है। इस फिल्म को बनाने में पूरे 24 साल लग गए, और आखिरकार जब यह फिल्म 1986 में रिलीज हुई, तब तक इसके तीन मुख्य स्तंभ डायरेक्टर और दो कलाकार इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे ।
‘लव एंड गॉड का सफर
1960 के दशक की शुरुआत में, ‘मुग़ल-ए-आज़म’ जैसी ऐतिहासिक फिल्म बनाने वाले महान निर्देशक के. आसिफ ने ठान लिया था कि वह लैला-मजनू की अमर प्रेमकथा को बड़े पर्दे पर लाएंगे। उन्होंने अपने इस सपने के लिए उस दौर के सबसे लोकप्रिय अभिनेता गुरु दत्त को साइन किया था। फिल्म की शुरुआती शूटिंग भी शुरू हो चुकी थी, लेकिन कुछ ही समय बाद गुरु दत्त डिप्रेशन के चलते दुनिया को अलविदा कह दिया। गुरु दत्त की मौत ने इस फिल्म के निर्माण पर जैसे ताला लगा दिया। आसिफ का सपना टूट गया, और फिल्म अधूरी रह गई।
के. आसिफ का अंतिम सपना
कई सालों बाद, 1970 के दशक में, आसिफ ने फिर से हिम्मत जुटाई और ‘लव एंड गॉड’ को दोबारा शुरू किया। इस बार उन्होंने संजीव कुमार को मजनू के किरदार में और अभिनेत्री निम्मी को लैला के रूप में कास्ट किया। शूटिंग धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी, और आसिफ को लग रहा था कि उनका सपना आखिरकार पूरा होने वाला है। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन जब संजीव कुमार उनसे मिलने उनके घर पहुंचे, तो आसिफ ने अचानक कहा कि उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही है। और 1971 में, के. आसिफ ने संजीव कुमार की गोद में ही दम तोड़ दिया। उनके निधन के बाद फिल्म फिर से अधूरी रह गई और अब ये फिल्म एक और दुखद मोड़ पर पहुंच गई थी।
संजीव कुमार की आखिरी कोशिश
- आसिफ के जाने के बाद भी संजीव कुमार ने हार नहीं मानी। उन्होंने फिल्म के लिए खुद पैसा जुटाया और बाकी हिस्सों की शूटिंग पूरी करने का प्रयास किया।
- वह इस प्रोजेक्ट को आसिफ को समर्पित करना चाहते थे। लेकिन नियति ने उन्हें भी नहीं बख्शा।
- 6 नवंबर 1985 को दिल का दौरा पड़ने से संजीव कुमार का निधन हो गया 9 और फिल्म एक बार फिर अपने मुख्य नायक को खो बैठी।
मनहूस का टैग
तीन महान कलाकारों की मौत के बाद, लव एंड गॉड को अंततः 1986 में रिलीज किया गया। फिल्म को पूरा करने में लगभग 24 वर्ष लगे, लेकिन जब यह सिनेमाघरों तक पहुंची, तब इसके निर्माता, निर्देशक और नायक तीनों नहीं रहे। फिल्म न तो बॉक्स ऑफिस पर चली और न ही दर्शकों को प्रभावित कर पाई। लेकिन इसके पीछे की त्रासदी ने इसे हिंदी सिनेमा की सबसे मनहूस फिल्म बना दिया। के. आसिफ चाहते थे कि ‘लव एंड गॉड’ भी ‘मुग़ल-ए-आज़म’ की तरह इतिहास में दर्ज हो, पर किस्मत ने इसे एक शापित फिल्म बना दिया।
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