नेपाल में हाल ही में शुरू हुए प्रदर्शनों की जड़ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगाया गया प्रतिबंध है। सरकार ने फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और एक्स (पूर्व में ट्विटर) जैसी सेवाओं को यह कहते हुए बंद कर दिया कि ये प्लेटफॉर्म पंजीकरण की समयसीमा का पालन नहीं कर पाए। सरकार का तर्क था कि इनसे फर्जी खबरें और अवैध गतिविधियां फैल रही हैं। लेकिन युवाओं ने इसे अपनी आज़ादी पर सीधा हमला माना। खासकर जेन-जी वर्ग ने इसे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने का प्रयास बताया। काठमांडू से शुरू हुआ यह विरोध जल्द ही देशभर में फैल गया और देखते-ही-देखते हिंसक रूप धारण कर लिया।
हिंसा और अराजकता का विस्तार
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद भी स्थिति शांत नहीं हुई। सड़कों पर गुस्साई भीड़ सरकारी भवनों, कार्यालयों और दस्तावेजों को आग के हवाले कर रही है। कई शहरों में धुआं उठती इमारतें और सड़कों पर बिखरी तबाही इस आंदोलन की गंभीरता का संकेत देती हैं। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में अब तक 20 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और सैकड़ों घायल हुए हैं। हालात इतने बिगड़ गए कि सरकार को सेना उतारनी पड़ी और पूरे देश में कर्फ्यू लागू करना पड़ा। यह स्थिति नेपाल की नाजुक राजनीतिक व्यवस्था को एक और गहरे संकट की ओर धकेल रही है।
जेलों से कैदियों का सामूहिक फरार
हिंसा के बीच एक और चौंकाने वाली घटना सामने आई, नेपाल के 18 जिलों की जेलों से करीब 6 हजार कैदी फरार हो गए। अकेले कास्की जिले से 773 और नवलपरासी से 500 कैदी भाग निकले। चितवन, कैलाली और जलेश्वर जैसे जिलों से भी सैकड़ों कैदी जेलों से निकलने में कामयाब रहे। यह न सिर्फ कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी गंभीर खतरा है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इनमें से कौन कैदी कितना खतरनाक है, इसका सही अनुमान लगाना बेहद मुश्किल है। प्रशासन अब इन फरार कैदियों की लिस्ट जारी कर खोज अभियान चला रहा है।
आंदोलन की गहरी जड़ें
हालांकि आगाज सोशल मीडिया प्रतिबंध से हुआ, लेकिन सूत्रों के अनुसार यह आंदोलन असल में लंबे समय से चले आ रहे गुस्से का नतीजा है। नेपाल के युवा भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता से परेशान हैं। उनका मानना है कि सरकार उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि जब सोशल मीडिया बंद किया गया तो इसे सहन न कर पाने वाले युवाओं ने सड़कों पर उतरकर विरोध को बड़े आंदोलन में बदल दिया। अब सवाल यह है कि क्या नेपाल सरकार इस विद्रोह को केवल बल प्रयोग से शांत कर पाएगी या फिर उसे युवाओं की मांगों को गंभीरता से सुनना होगा। वर्तमान हालात संकेत दे रहे हैं कि यह केवल कानून-व्यवस्था का संकट नहीं है, बल्कि नेपाल के लोकतांत्रिक भविष्य की परीक्षा भी है।
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