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Bihar Elections 2025 : बिहार का दंगल: क्या बाहुबली पिता की विरासत संभाल पाएगी नई पीढ़ी? जानें 2025 चुनाव का सबसे बड़ा खेल!

बिहार भारत
bihars battleground will the new generation be able to carry on their powerful fathers legacy learn about the biggest game of the 2025 elections

बिहार की राजनीति हमेशा से ही रोमांच से भरी रहती है जहां जाति, परिवार और ताकतवर नेताओं का खेल चलता रहता है। इस बार 2025 के विधानसभा चुनाव में पुराने बाहुबलियों और बड़े नेताओं के बच्चे मैदान में उतरने को बेताब हैं। कोई अपने बाप की विरासत को संभालने को तैयार है तो कोई बाहुबली का नाम फिर से चमकाने को जी जान लगा रहा है। बिहार की 243 सीटों पर वोटिंग 6 और 11 नवंबर को होगी जबकि नतीजे 14 नवंबर को आएंगे। एनडीए और महागठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला तो होगा ही लेकिन परिवारवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि बीजेपी ने भी अपने सांसदों और विधायकों के रिश्तेदारों को टिकट न देने का फैसला लिया फिर भी कई परिवार चुनावी रिंग में डटे हुए हैं।

बाहुबलियों की नई संतानें

बिहार में बाहुबलियों का नाम आते ही अपहरण, रंगदारी और सत्ता के खेल की याद आ जाती है लेकिन अब उनकी नई पीढ़ी राजनीति की दुनिया में कदम रख रही है। मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा यादव जीरादेई सीट से राजद के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं। शहाबुद्दीन ने 1996 से 2004 तक चार बार इस सीट पर जीत हासिल की थी। उनकी पत्नी चुनाव हार गईं लेकिन ओसामा को उम्मीद है कि वे परिवार का नाम रोशन करेंगे। आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद शिवहर से महागठबंधन के साथ जुड़े हुए हैं और 2020 में राजद से जीत चुके हैं। अब उनके भाई अंशुमान आनंद भी मैदान संभालने को तैयार हैं। पप्पू यादव के बेटे सार्थक रंजन सुपौल से कांग्रेस के टिकट पर उतर सकते हैं। पप्पू ने निर्दलीय और राजद से कई चुनाव जीते हैं। प्रभुनाथ सिंह के बेटे महाराजगंज से जदयू में सक्रिय हैं जबकि सुनील पांडे के बेटे विशाल प्रशांत बीजेपी से तरारी सीट पर उपचुनाव जीत चुके हैं और अब फिर से दौड़ में हैं।

राजनीतिक परिवारों का दबदबा

बिहार में परिवारवाद कोई नई चीज नहीं है और सबसे ज्यादा चर्चा लालू प्रसाद यादव के परिवार की होती है। तेजस्वी यादव महागठबंधन के चेहरे बने हुए हैं जबकि तेज प्रताप अलग हो चुके हैं लेकिन दोनों ही चुनाव लड़ेंगे। मीसा भारती सांसद हैं और रोहिणी आचार्य भी राजनीति में सक्रिय हैं। लालू के साले साधु यादव और सुभाष यादव भी मैदान में डटे हुए हैं। राम विलास पासवान का परिवार अब बंट चुका है जहां चिराग पासवान लोक जनशक्ति पार्टी के नेता हैं। पशुपति पारस अलग धड़े के मुखिया बने हुए हैं और प्रिंस राज पासवान भी चुनावी तैयारी में जुटे हैं। जीतन राम मांझी के बेटे संतोष मांझी मंत्री हैं जबकि उनकी बहू दीपा और समधी ज्योति विधायक हैं। अब परिवार में कोई नया सदस्य भी आ सकता है। जगन्नाथ मिश्रा के बेटे नीतीश मिश्रा मंत्री हैं और उनके भतीजे विजय कुमार मिश्रा तथा ऋषि मिश्रा राजनीति में सक्रिय हैं। शकुनी चौधरी के बेटे सम्राट चौधरी उपमुख्यमंत्री हैं जबकि दूसरा बेटा टिकट की आस लगाए बैठा है। जगदानंद सिंह के बेटे सुधाकर सिंह सांसद हैं और अजीत सिंह रामगढ़ से उपचुनाव हारने के बाद फिर से कोशिश करेंगे।

कर्पूरी ठाकुर और जगजीवन राम की विरासत

कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर केंद्र में मंत्री हैं और उनकी पोती जन सुराज पार्टी में शामिल हो चुकी है। अगर टिकट मिला तो वे चुनाव लड़ेंगी। जगजीवन राम की पोती मीरा कुमार सांसद रह चुकी हैं जबकि उनके बेटे अंशुल अवस्थी पटना साहिब से 2024 लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं। अशोक चौधरी के पिता महावीर चौधरी कांग्रेसी नेता थे और अशोक खुद मंत्री हैं। उनकी बेटी शांभवी जायसवाल सांसद हैं। महेश्वर हजारी के बेटे सनी हजारी लोकसभा चुनाव हार गए लेकिन विधानसभा में फिर कोशिश करेंगे। नरेंद्र सिंह के बेटे सुमित कुमार सिंह मंत्री हैं और चकाई सीट से दोबारा चुनाव लड़ेंगे। तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम और शाहनवाज किशनगंज तथा अररिया सीटों से तैयार हैं।

परिवारवाद की मजबूरी

राजनीतिक विशेषज्ञ चंद्रभूषण राय कहते हैं कि बिहार में परिवारवाद की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं। नीतीश कुमार परिवारवाद के खिलाफ हैं और उन्होंने अपने बेटे को राजनीति से दूर ही रखा। लेकिन जदयू में कई नेता अपने बच्चों को आगे बढ़ा रहे हैं। बीजेपी भी इसका विरोध करती है लेकिन गठबंधन की मजबूरी में टिकट देनी पड़ती है। प्रोफेसरों का कहना है कि अगर नेता के बच्चे अपने दम पर आगे बढ़ें तो कोई बुराई नहीं लेकिन अक्सर नाम के बल पर ही टिकट मिल जाता है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी 125 परिवारों के कब्जे के खिलाफ है लेकिन बिहार की सियासत में परिवारवाद का बोलबाला बना रहेगा।

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