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Bihar Elections 2025 : 28 साल पहले क्या हुआ था? जो आज भी तेजस्वी यादव का पीछा नहीं छोड़ता, ये है सियासी राज!

बिहार भारत
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बिहार की सियासत में कुछ शब्द इतने चिपक जाते हैं कि वे नेताओं की पूरी कहानी बदल देते हैं। जंगलराज ऐसा ही एक शब्द है, जो लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी आरजेडी से हमेशा जुड़ा रहेगा। यह शब्द उनके और राबड़ी देवी के शासन को अराजकता का प्रतीक बताता है। आज भी यह तेजस्वी यादव को सताता है। लेकिन यह शब्द आया कहां से? इसकी कहानी 28 साल पहले शुरू हुई, जब पटना हाईकोर्ट ने एक टिप्पणी की, जिसने बिहार की सियासत को हिला दिया।

1997 का वो मुश्किल समय

1997 में बिहार की हालत खराब थी। लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में फंस चुके थे। 25 जुलाई को उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सत्ता सौंप दी। उसी साल मॉनसून की बारिश ने पटना को पानी में डुबो दिया। सड़कों पर कीचड़ था, नालियां बंद थीं और घरों में पानी घुस गया। शहर की हालत देखकर सामाजिक कार्यकर्ता कृष्ण सहाय ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की। जस्टिस बीपी सिंह और जस्टिस धर्मपाल सिन्हा ने इसकी सुनवाई की। केस का नंबर था एमजेसी 1993 ऑफ 1996। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की कि बिहार में कोई सरकार नहीं है, बस जंगलराज चल रहा है। कुछ भ्रष्ट अफसर ही सब कुछ चला रहे हैं। यह बात पटना नगर निगम और बिहार जल निगम की नाकामी पर थी।

विपक्ष ने बनाया सियासी हथियार

कोर्ट की यह टिप्पणी अखबारों की सुर्खियां बनी। विपक्ष ने इसे लपक लिया। उस समय बिहार में अपराध बहुत बढ़ गया था। अपहरण, रंगदारी और माफिया का डर हर तरफ था। 2000 के चुनाव में विपक्ष ने जंगलराज को लालू के शासन से जोड़ दिया। कोर्ट ने यह बात बाढ़ और खराब ड्रेनेज सिस्टम के लिए कही थी, लेकिन विपक्ष ने इसे कानून-व्यवस्था की नाकामी से जोड़ा। 2005 में नीतीश कुमार ने जंगलराज के खिलाफ सुशासन का नारा दिया। बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी ने इसे लालू के खिलाफ बड़ा हथियार बनाया। कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि पटना में ड्रेनेज और सीवरेज सिस्टम की हालत खराब है। शहर भारत की सबसे गंदी राजधानी बन चुका है।

राबड़ी का जवाब और अपराध का साया

2000 में नालंदा की एक रैली में राबड़ी देवी ने कहा कि हां, बिहार में जंगलराज है, लेकिन जंगल में सिर्फ एक शेर होता है, और लोग उसका राज मानते हैं। वे लालू को शेर बता रही थीं। लेकिन 1990 से 2004 तक बिहार में कई बड़े अपराध हुए। चंपा विश्वास बलात्कार कांड, शिल्पी गौतम हत्याकांड और डॉक्टरों के अपहरण की खबरें देशभर में चर्चा में थीं। लालू के साले साधु और सुभाष यादव पर रंगदारी के इल्जाम लगे। सड़कें टूटी थीं, विकास ठप था। पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि उस समय अपहरण की घटनाएं पूरे देश में बदनाम थीं।

तेजस्वी पर भी जंगलराज का ठप्पा

2005 में नीतीश की जीत ने जंगलराज को और हवा दी। लालू का 15 साल का शासन खत्म हुआ। उनकी सामाजिक न्याय की छवि अराजकता के साये में दब गई। 1997 में जब कोर्ट ने यह टिप्पणी की, तब तेजस्वी यादव सिर्फ सात साल के थे। अब वे आरजेडी की कमान संभाल रहे हैं, लेकिन जंगलराज का ठप्पा उनका पीछा नहीं छोड़ता। यह शब्द अब बिहार की सियासत का हिस्सा बन चुका है।

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