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क्यों कहते हैं “गणपति बप्पा मोरया”? जानिए इस जयघोष का इतिहास और महत्व

“गणपति बप्पा” के साथ ही क्यों बोला जाता है? इसका जवाब हमें इतिहास, भक्ति और लोककथाओं की गहराई में ले जाता है।

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हर साल गणेश चतुर्थी के मौके पर महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा और देशभर की गलियों में एक ही नारा गूंजता है “गणपति बप्पा मोरया!” ढोल-ताशों की गूंज, फूलों की महक, मोदकों की मिठास और भक्तों का नृत्य सब कुछ इस जयघोष से जुड़कर एक अद्भुत ऊर्जा पैदा करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हम “मोरया” क्यों कहते हैं? यह शब्द कहां से आया और “गणपति बप्पा” के साथ ही क्यों बोला जाता है? इसका जवाब हमें इतिहास, भक्ति और लोककथाओं की गहराई में ले जाता है।

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संत मोरया गोसावी कौन थे?

“मोरया” शब्द को संत मोरया गोसावी की भक्ति से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन गणेश भक्ति में समर्पित कर दिया। कहा जाता है कि उन्हें एक बार इंद्रायणी नदी में श्रीगणेश का दर्शन हुआ और बाद में उन्हें गणेशजी की एक मूर्ति मिली। उन्होंने उस मूर्ति को पुणे के पास चिंचवाड़ में स्थापित किया। धीरे-धीरे चिंचवाड़ गणेश उपासना का एक बड़ा केंद्र बन गया।

आज भी चिंचवाड़ स्थित संत मोरया गोसावी की समाधि मंदिर में लगातार “गणपति बप्पा मोरया” की गूंज सुनाई देती है। परंपरा के अनुसार, संजीवन समाधि लेने से पहले संत को स्वयं भगवान गणपति ने आशीर्वाद दिया था कि उनका नाम हमेशा भक्तों की वाणी में गणपति के साथ जुड़ा रहेगा। यही कारण है कि हम कभी सिर्फ “गणपति बप्पा” नहीं कहते, बल्कि हमेशा “गणपति बप्पा मोरया” कहते हैं।

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मोरया” शब्द के अर्थ

समय के साथ “मोरया” के कई अर्थ और व्याख्याएँ सामने आईं हैं

  1. संत मोरया की याद – सबसे प्रमुख मान्यता यही है कि यह नारा संत मोरया गोसावी को सम्मान देने के लिए बोला जाता है।
  2. आमंत्रण का संकेत – कुछ लोग मानते हैं कि यह “म्होर” (आगे) और “या” (आओ) से बना है, जिसका अर्थ है “आगे आइए भगवान।”
    इस तरह, यह नारा सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि श्रद्धा, स्मृति, सम्मान और आमंत्रण का संगम है।
  3. मराठी जड़ें – मराठी भाषा में “मोरया” का अर्थ “महान नेता” या “महान राजा” भी माना जाता है।

गणपति बप्पा मोरया का असर

जब लाखों लोग एक साथ यह नारा लगाते हैं, तो यह सिर्फ आवाज़ नहीं रहती, बल्कि एक ऊर्जा बन जाती है। यह लोगों को जोड़ती है, समुदायों को एक करती है और गलियों को चलते-फिरते मंदिर में बदल देती है।

किसी से भी पूछ लीजिए, लोग इसे क्यों कहते हैं? कोई कहेगा बाधाएँ दूर करने के लिए, कोई कहेगा सौभाग्य के लिए, कोई कहेगा बस उत्साह में जुड़ जाता हूँ। यही इसकी खूबसूरती है।

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है?

गणेश चतुर्थी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि गणपति बप्पा का घर-आना है। इसके पीछे कई कारण हैं

जन्मोत्सव: पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी दिन माता पार्वती ने भगवान गणेश की रचना की थी।

बुद्धि और ज्ञान के देवता: विद्यार्थी हो या व्यापारी, हर कोई उनकी कृपा चाहता है।

विघ्नहर्ता: गणपति बाधाएँ दूर करके नए कार्यों को सफल बनाते हैं।

एकता का पर्व: लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1890 के दशक में इसे सार्वजनिक उत्सव बनाया, ताकि समाज एकजुट हो और आज़ादी की लड़ाई में हिम्मत मिले।

सांस्कृतिक उत्सव: दस दिन तक संगीत, नाटक, कला और नृत्य से पूरा वातावरण जीवंत हो उठता है।

एक नारा, एक परंपरा

“गणपति बप्पा मोरया” केवल जयघोष नहीं, बल्कि यह एक स्मृति है संत मोरया की, एक प्रार्थना है गणपति से, और एक संदेश है एकता का।

जब भी आप इस नारे में शामिल होते हैं, तो याद रखिए आप सिर्फ उत्सव नहीं मना रहे, बल्कि संत मोरया गोसावी की भक्ति और सदियों पुरानी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

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