सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को SIR की प्रक्रिया को लेकर दायर कई याचिकाओं पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को संविधान और जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कराने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने इसी कानूनी अधिकार और उसकी वैधता पर अपना निर्णय दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग का पक्ष सही माना
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR प्रक्रिया को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं माना जा सकता। अदालत के मुताबिक, मतदाता सूची को सही और अपडेट रखना निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव की जरूरी शर्त है। कोर्ट ने यह भी कहा कि साफ-सुथरी वोटर लिस्ट बनाए रखना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
कई राज्यों में जारी है SIR प्रक्रिया
रिपोर्ट्स के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद 29 जनवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस दौरान अदालत ने SIR अभियान पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई। चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में पूरी हो चुकी है, जबकि उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में अभी भी इसका काम जारी है।
विपक्षी नेताओं समेत कई लोगों ने दी थी चुनौती
SIR प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं में कई राजनीतिक दलों के नेताओं और सामाजिक संगठनों ने हिस्सा लिया था। ये याचिकाएं खासतौर पर बिहार में चुनाव आयोग द्वारा शुरू किए गए अभियान के बाद दाखिल की गईं। मामले में चुनाव सुधार से जुड़े संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न विपक्षी दलों के सांसदों ने आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
आधार कार्ड को लेकर कोर्ट ने दी थी अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कहा था कि वोटर लिस्ट सत्यापन प्रक्रिया में आधार कार्ड को भी पहचान दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि आधार को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने आयोग को यह अधिकार भी दिया था कि वह जमा किए गए आधार कार्ड की वैधता और सही जानकारी की जांच कर सके।
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