राजस्थान: जयपुर में बजट सत्र चल रहा था, लेकिन अचानक एक बयान ने पूरा सदन हिला दिया। वैर से बीजेपी विधायक बहादुर सिंह कोली ने वर्तमान सरकार के बजट की तुलना “छोरे के जन्म” से कर दी, जबकि पिछली कांग्रेस सरकार के बजट को “छोरी के जन्म” जैसा बताया। कोली ने आगे कहा, उनकी सरकार का बजट तो “जवानी का बजट” है, जबकि पिछली सरकार का बजट “बुढ़ापे का बजट” था, जिसे चुनाव से ठीक पहले पेश किया गया था। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार ने लगातार तीन बजटों में दमदार फैसले लिए हैं, और इसी वजह से उन्होंने इसे “छोरा पैदा होना” कहा। उनके मुताबिक, यह विकास और मजबूती का संकेत है। जैसे ही कोली ने ये बातें कहीं, विपक्षी दलों ने फौरन इसका विरोध शुरू कर दिया।
कांग्रेस ने किया विरोध
कोली की टिप्पणी पर कांग्रेस के विधायक भड़क गए। नेता प्रतिपक्ष टीका राम जूली ने कहा, ये सोच महिलाओं के साथ भेदभाव दिखाती है। उनके मुताबिक, सदन जैसे मंच पर बेटे-बेटी में फर्क करना बेहद शर्मनाक है। जूली ने खुद का उदाहरण देते हुए बताया कि वो दो बेटियों के पिता हैं और हाल ही में एक बेटी की शादी की है। ऐसे में, बेटियों को कमतर दिखाने वाली मानसिकता को वो कतई नहीं मानते। कांग्रेस ने सवाल उठाया, क्या सत्ता पक्ष सचमुच महिला सशक्तिकरण चाहता है या ये सब बस राजनीतिक बातें हैं? विपक्ष का मानना है कि बजट पर चर्चा विकास, योजनाएं और आर्थिक प्राथमिकताओं पर होनी चाहिए, न कि ऐसे लैंगिक प्रतीकों पर।
विधायक का बचाव, ‘हमारी ब्रजभाषा है’
बात बढ़ी तो बहादुर सिंह कोली ने सफाई दी। मीडिया से बोले, उनकी टिप्पणी में कुछ भी गलत नहीं है, ये तो ब्रजभाषा की आम बात है। उनका कहना था, उन्होंने बस मजबूत बजट का उदाहरण देने के लिए ये रूपक इस्तेमाल किया। कोली ने ये भी दोहराया कि पिछले सरकार का बजट चुनावी और लुभावना था, इसलिए उसे “छोरी के जन्म” जैसा कहा। उनका दावा था कि उनका मकसद किसी का अपमान करना नहीं था, बस अपनी सरकार का कामकाज बेहतर दिखाना था। लेकिन, उनकी सफाई के बावजूद विवाद थमा नहीं।
सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं, समाज का भी
ये मामला सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा। अब बहस समाज की सोच और भाषा की संवेदनशीलता तक पहुंच गई है। विशेषज्ञ मानते हैं, जनता के सामने बोले गए शब्द समाज में असर डालते हैं, इसलिए नेताओं को बोलने में सावधानी रखनी चाहिए। राजस्थान का बजट सत्र अक्सर तीखी बहसों के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार असली चर्चा आर्थिक मुद्दों की जगह भाषा और प्रतीकों पर टिक गई। आने वाले दिनों में देखना होगा कि ये विवाद कहां तक जाता है, राजनीतिक बयानबाजी तक ही रहता है या और गहराता है। फिलहाल, इस एक बयान ने सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव को बढ़ा दिया और महिला सम्मान का सवाल फिर से चर्चा के बीच में ला दिया है।
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