ईरान इन दिनों उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। कई शहरों में लोग सीधी सड़क पर उतर आए हैं, सरकार के खिलाफ नारे लग रहे हैं। शुरुआत तो महंगाई और आर्थिक तंगी से हुई थी, लेकिन अब ये गुस्सा सिर्फ जेब तक सीमित नहीं रहा। बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, रियाल की हालत खराब है, और लोगों का धैर्य टूट चुका है। प्रदर्शनकारी खुलकर कह रहे हैं कि मौजूदा इस्लामिक रिपब्लिक सिस्टम उनकी असली परेशानियां सुलझा ही नहीं पाया। दूसरी तरफ सरकार हर बार की तरह इन प्रदर्शनों को “विदेशी साजिश” बताने में लगी है, मगर जमीनी हालात काफी उलझे और संवेदनशील हैं।
सरकार ने दी प्रदर्शनकारियों को चेतावनी
विरोध तेज हुआ तो ईरान के अटॉर्नी जनरल मोहम्मद मोवाहेदी आज़ाद ने सख्त लहजे में चेतावनी दी। सरकारी टीवी पर उन्होंने साफ कहा, जो भी प्रदर्शन में शामिल है या उसकी किसी तरह मदद कर रहा है, उसे ‘मोहारेब’, यानी ‘खुदा का दुश्मन’ माना जाएगा। ये चेतावनी सिर्फ सड़कों पर उतरे लोगों के लिए नहीं है, बल्कि हर उस शख्स के लिए है जो किसी भी तरह से आंदोलन का हिस्सा बनता है। सरकार ने साफ कर दिया है, इस बार कोई नरमी नहीं होगी, कार्रवाई सीधी और तेज़ चलेगी।
‘मोहारेब’ कानून क्या कहता है
ईरान के कानून में आर्टिकल 186 और 190 इस पूरे मामले की जड़ में हैं। इन धाराओं के मुताबिक, अगर कोई संगठन या ग्रुप इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ हथियार उठाता है, तो उसके समर्थकों को भी दोषी माना जाता है, अगर वे सीधे हिंसा में शामिल न भी हों। ‘मोहारेब’ घोषित कर दिए जाने पर सजा बेहद सख्त है, फांसी, अंग काटना या उम्र भर के लिए देश निकाला। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इन कानूनों की व्याख्या इतनी खुली है कि सरकार इन्हें असहमति की हर आवाज दबाने के लिए इस्तेमाल करती है।
‘कोई दया नहीं’
सरकार ने अभियोजन एजेंसियों को साफ निर्देश दिए, बिना देरी के आरोप लगाओ, और फैसले में कोई नरमी मत बरतो। जो लोग “देश में असुरक्षा फैला रहे हैं या विदेशी ताकतों को फायदा पहुंचा रहे हैं”, उनके लिए कोई रियायत नहीं होगी। इस पूरे रुख ने ईरान के अंदर डर का माहौल बना दिया है। कई विश्लेषक मानते हैं कि इस तरह की धमकियां शायद थोड़ी देर के लिए आंदोलन को थाम लें, लेकिन लंबे वक्त में गुस्सा और बढ़ सकता है।
क्या है आंदोलन की जड़?
देश से बाहर रह रहे क्राउन प्रिंस रेज़ा पहलवी ने भी लोगों से खुली अपील की, सड़कों पर उतरो, ईरान के पुराने प्रतीकों के साथ सार्वजनिक जगहों पर अपनी मौजूदगी दिखाओ। अगर आंदोलन की जड़ देखें तो दिसंबर 2025 में ईरानी रियाल का ऐतिहासिक गिरना एक बड़ा कारण रहा। आर्थिक तंगी ने लोगों की सहनशक्ति तोड़ दी, और अब ये असंतोष सीधे-सीधे राजनीतिक बदलाव की मांग बन चुका है। असली सवाल यही है, सरकार सख्ती से हालात संभालेगी या बातचीत का रास्ता खोलेगी?
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