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RJD का नया अवतार…BJP-JDU के सवर्ण वोट बैंक की सेंधमारी में लगी पार्टी!

MY खांचे से बाहर निकलने की राजद रणनीति बना रही। भाजपा-जदयू के पारंपरिक वोट को चुनौती देने की दिशा में कर रही है काम।

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले दौर में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अपनी पुरानी पहचान से हटकर एक नए अवतार में प्रवेश करने की कोशिश कर रही है। यदि पहले राजद को यादव-मौलिक (MY) राजनीति से जोड़कर देखा जाता था, तो अब इसे MY खांचे से बाहर निकलने और एक अधिक व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाने की रणनीति अपनाते देखा जा रहा है।

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राजद और MY खांचे का बदलाव

विशेषकर भूमिहार समुदाय के प्रति अब राजद में एक नया रुझान नजर आ रहा है। चर्चा है कि इस चुनाव में राजद लगभग 10 भूमिहार उम्मीदवारों को टिकट दे सकती है। यह कदम भाजपा-जदयू के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक को चुनौती देने की दिशा में एक रणनीतिक दांव माना जा रहा है।

राजद की सवर्ण-रणनीति है!

राजद के भीतर अब यह संदेश फैलाया जा रहा है कि “भूरा बाल साफ करो” जैसे कटाक्ष करने वालों को पार्टी में प्रवेश नहीं मिलेगा। यह एक स्पष्ट संकेत है कि पार्टी इस बार उन नेताओं और विचारधाराओं से दूरी रखना चाहती है, जो जातिगत कटुता को आगे बढ़ाते थे।

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उदाहरण स्वरूप, पुराने विरोधी और दबंग नेता अशोक महतो को पार्टी ने इस बार दरकिनार किया है। महतो का भूमिहारों से पुराना टकराव जगजाहिर है। जब अशोक महतो अपनी पत्नी अनिता कुमारी को टिकट दिलवाने की मांग लेकर राबड़ी आवास पहुंचे, तो उन्हें प्रवेश तक नहीं मिला। यह संकेत है कि राजद अब कठोर नीति अपनाने को तैयार है। पुराने गुटों को पीछे छोड़, नए समीकरणों पर भरोसा।

इतिहास और आरोपों का साथ

भारतीय राजनीति के इतिहास में राजद और भूमिहार वोटबैंक के बीच टकराव की कहानियां लंबी रही हैं। 2005 में पूर्व मंत्री राजो सिंह की कांग्रेस कार्यालय में हत्या और अशोक महतो की भूमिका इस विवाद को और गहरा बनाती है। हालांकि महतो को बाद में अदालत ने बरी कर दिया, लेकिन उनकी राजनीतिक छवि स्थायी रूप से विवादों से जुड़ी रही। महतो के 17 साल की जेल की सजा और हालिया राजनीति में राजद द्वारा उनकी उपेक्षा इस बात का संकेत है कि पार्टी पुराने संघर्ष को पीछे छोड़ने को इच्छुक है। या कहें, नई “सवर्ण-हितैषी” तुकबंदी को सम्मान देना चाहती है।

भूमिहार नेताओं का राजद में प्रवेश

  • राजद ने कई बड़े भूमिहार नेताओं को आत्मीयता देकर जोड़ा है — यह सिर्फ वादे नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति है।
  • जगदीश शर्मा– मगध क्षेत्र के प्रभावशाली भूमिहार नेता।
  • राहुल शर्मा– जगदीश शर्मा के पुत्र, GHOSI सीट से राजद से चुनाव की चर्चाएं।
  • नरेन्द्र सिंह (बोगो सिंह) – मटिहानी विधानसभा के पूर्व विधायक, जो अब RJD से जुड़े हैं।
  • संजय कुमार सिंह– जदयू से RJD में आये पूर्व विधायक, भूमिहार समाज से।
  • सूरजभान सिंह– बाहुबली नेता, भूमिहार समाज से आने वाले, जिनका नाम इस सूची में शामिल है।

इन नए प्रवेशों से पटना, मुंगेर, बेगूसराय जिलों में जातीय समीकरण बदलने की संभावना है। इसके अलावा लालगंज, लखीसराय, केसरिया, गोविंदगंज जैसी सीटों से भूमिहार प्रत्याशी के टिकट की चर्चा जोरों पर है।

RJD की रणनीति और चुनौतियां

सवर्ण समावेशी छवि
पार्टी यह दिखाना चाहती है कि वह सिर्फ जातिगत राजनीति नहीं करती, बल्कि हर वर्ग का प्रतिनिधित्व चाहती है।

वोटबैंक तोड़ना
भाजपा-जदयू का पारंपरिक सवर्ण-आधारित वोट बैंक कमजोर करना।

पुराने गुटों से दूरी
अशोक महतो जैसे नेताओं को किनारे करना — ताकि पुरानी छवि का असर कम हो।

RJD की चुनौती

माले, लो ग्राम आदि सहयोगियों के साथ टकराव से बचना, क्योंकि राजद ने कई सीटों पर उनके प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी उतारने की रणनीति की है। लेकिन यह RJD के लिए बनाई जा रही ये रणनीति आसान नहीं होने वाली। ऐसे में पुराने सहयोगी दल नाराज़ हो सकते हैं, जातीय राष्ट्रीयता का आरोप लग सकता है और सवर्ण वोटरों में अविश्वास भी बढ़ सकता है।

RJD इस चुनाव में एक नया चेहरा पहनने की कोशिश में है। एक ऐसा चेहरा जो जाति संघर्ष से ऊपर उठकर सामूहिक राजनीति की ओर अग्रसर हो। भूमिहारों को टार्गेट करना एक जानिब तो रणनीति है, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए संवेदनशीलता, सामंजस्य और संगठनिक समन्वय की आवश्यकता होगी।

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