दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम इस समय विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप की मेजबानी कर रहा है, लेकिन शनिवार को वहां एक ऐसी घटना हुई जिसने सभी को चौंका दिया। प्रैक्टिस सेशन के दौरान केन्या के कोच डेनिस मरागिया और जापान की कोच मेइको ओकुमात्सु पर आवारा कुत्तों ने हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि यह घटना उस वक्त हुई जब दोनों ट्रैक के पास खिलाड़ियों के तैयारी की निगरानी कर रहे थे। हमले में दोनों कोचों को पैर और जांघ में गंभीर चोटें आईं, जिन्हें तुरंत प्राथमिक उपचार देकर अस्पताल भेजा गया। इसी दौरान चार सुरक्षाकर्मी भी कुत्तों के हमले का शिकार हो गए। मौके पर मौजूद अधिकारियों ने तुरंत नियंत्रण पाया, लेकिन तब तक अफरा-तफरी मच चुकी थी। अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के सामने ऐसी घटना होना भारत की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न छोड़ गया।
आयोजकों पर उठे सवाल
घटना के बाद खेल आयोजन समिति और दिल्ली प्रशासन पर लापरवाही के आरोप लगने लगे। खिलाड़ियों और कोचों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इतने बड़े आयोजन में सुरक्षा मानकों का इस तरह टूट जाना अस्वीकार्य है। राजनीतिक गलियारों में भी यह मामला चर्चा का विषय बन गया। कुछ नेताओं ने कहा कि यह सिर्फ एक सुरक्षा चूक नहीं बल्कि शहर की छवि पर भी धब्बा है।
बीजेपी नेता ने जताई नाराजगी
इस पुरे मामले पर बीजेपी नेता विजय गोयल ने एक्स पर पोस्ट के जरिये अपनी नाराजगी बयां की, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा “जिन्होंने आवारा कुत्तों को सड़क पर छोड़ने का आदेश दिया था क्या वो इसकी जिम्मेदारी लेंगे? देश बदनाम हो रहा है, जिम्मेदार कौन?”
दिल्ली के जेएलएन स्टेडियम में अंतर्राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स के दौरान जापान और केन्या के कोचों को आवारा कुत्तों ने काट लिया।
— Vijay Goel (@VijayGoelBJP) October 4, 2025
यह देश की साख पर धब्बा है।
क्या सुप्रीम कोर्ट के जज, जिन्होंने कुत्तों को सड़कों पर खुला छोड़ने का आदेश दिया था, अब इसकी जिम्मेदारी लेंगे?
देश बदनाम हो… pic.twitter.com/R8wQlaPKg8
कोर्ट के आदेश
दिल्ली और आसपास के इलाकों में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या पहले से चिंता का विषय रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महीने पहले ही आदेश दिया था कि कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें उनके मूल क्षेत्रों में छोड़ा जाए, लेकिन आक्रामक या रेबीज़ संदिग्ध कुत्तों को शेल्टर में रखा जाए। हालांकि, इस आदेश का पालन पूरी तरह नहीं हो पाया है। स्थानीय प्रशासन और नगर निकायों के बीच समन्वय की कमी, संसाधनों की कमी और निगरानी तंत्र की ढिलाई के कारण हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। खेल आयोजनों जैसे संवेदनशील स्थलों पर भी सुरक्षा की अनदेखी यह दिखाती है कि नीतियाँ बन तो जाती हैं, पर उनका सही क्रियान्वयन अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
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