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नवरात्रि पर ज्वाला देवी मंदिर का महत्व और उससे जुड़ी रहस्यमयी कथाएँ

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले का ज्वाला देवी मंदिर शक्तिपीठों में अपनी अलग पहचान रखता है। यहां सदियों से बिना तेल-घी के जलती रहस्यमयी ज्वालाएँ भक्तों की आस्था का केंद्र हैं।

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भारत भूमि पर असंख्य मंदिरों की उपस्थिति करोड़ों लोगों की आस्था को जीवंत बनाए रखती है। इन पवित्र धामों के साथ कई चमत्कारिक घटनाएँ और अद्भुत रहस्य जुड़े हुए हैं, जिनसे श्रद्धालुओं का विश्वास और अधिक दृढ़ हो जाता है। इन्हीं में से एक है हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ज्वाला देवी मंदिर, जिसे शक्तिपीठों में एक अनोखी पहचान मिली है।

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यह मंदिर अपनी प्राचीनता और चमत्कारिक अग्नि ज्वालाओं के कारण विशेष प्रसिद्ध है। गर्भगृह में निरंतर जलती हुई ये लौ किसी घी, तेल या किसी अन्य ईंधन से नहीं जलती, बल्कि यह प्राकृतिक रूप से प्रकट होती है। भक्त मानते हैं कि यह अग्नि स्वयं मां ज्वाला का स्वरूप है। हैरानी की बात यह है कि यह लौ पानी के संपर्क में आने पर भी बुझती नहीं है, बल्कि सदियों से लगातार प्रज्वलित है। यही कारण है कि इसे देखने वाले हर श्रद्धालु का विश्वास और भी गहरा हो जाता है।

पौराणिक कथा और इतिहास

मान्यता है कि जब भगवान विष्णु ने देवी सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित किया था, तब उनकी जीभ इसी स्थान पर गिरी थी। उसी समय यहां अग्नि की रहस्यमयी ज्वालाएँ प्रकट हुईं, जिनके चारों ओर बाद में मंदिर का निर्माण कराया गया। कहा जाता है कि कांगड़ा के राजा भूमि चंद कटोच ने इस मंदिर की स्थापना करवाई थी। इतना ही नहीं, महाभारत काल में पांडवों ने भी यहां आकर इसकी मरम्मत और पूजा-अर्चना की थी, जिसका उल्लेख स्थानीय लोककथाओं और गीतों में मिलता है।

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अकबर और ज्वाला देवी मंदिर की कथा

इतिहास में दर्ज एक प्रसंग के अनुसार, मुगल सम्राट अकबर ने ज्वाला देवी मंदिर की अग्नि की परीक्षा लेने के लिए एक अनोखा उपाय किया। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि मंदिर तक नहर बनाकर पानी छोड़ा जाए ताकि ज्वालाएँ बुझ जाएँ। किंतु सभी को आश्चर्य हुआ कि प्रचंड जलधारा के बावजूद ज्वाला शांत नहीं हुई। इस अलौकिक चमत्कार को देखकर अकबर ने मां के प्रति सम्मान जताते हुए सोने का छत्र भेंट किया। किंवदंती है कि मां ने उस भेंट को स्वीकार नहीं किया और वह छत्र किसी अज्ञात धातु में परिवर्तित हो गया। आज भी यह छत्र मंदिर में सुरक्षित रखा हुआ है, जिसे देखने देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं।

मां दुर्गा के नौ स्वरूप

ज्वाला देवी मंदिर में श्रद्धालु केवल मां ज्वाला की ही नहीं, बल्कि दुर्गा के नौ स्वरूपों की भी आराधना करते हैं। इनमें महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजनी देवी शामिल हैं। मान्यता है कि इन सभी रूपों के दर्शन करने से भक्त के जीवन की सभी कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं और वह सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त करता है।

इस प्रकार, ज्वाला देवी मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि यह धर्म, इतिहास और रहस्य का अद्भुत संगम है। नवरात्रि के पावन अवसर पर यहां दर्शन करने से भक्तों को विशेष आध्यात्मिक शांति और शक्ति की अनुभूति होती है।

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