नेपाल इन दिनों राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। सोशल मीडिया प्रतिबंध से शुरू हुआ जनाक्रोश, हिंसक प्रदर्शनों और कई मौतों के बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे तक पहुंचा। इसी पृष्ठभूमि में काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह, जिन्हें लोग बालेन के नाम से जानते हैं, युवाओं के बीच एक संभावित राष्ट्रीय नेता के रूप में सामने आए हैं। हालांकि उन्होंने प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उतरने की घोषणा नहीं की, लेकिन जनआंदोलन से मिले समर्थन ने उन्हें देशव्यापी पहचान दिला दी है। फेसबुक पर लिखे उनके संदेश, जिनमें उन्होंने युवाओं से संयम और शांति की अपील की, इस बात का संकेत देता है कि वे सिर्फ एक नगर प्रमुख नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक प्रतीक बन चुके हैं।
रैप की दुनिया से राजनीति तक का सफर
बालेन का नाम पहली बार रैप की दुनिया में तब गूंजा जब उनके गानों में भ्रष्टाचार, भेद-भाव और सत्ता की नकामयाबी के खिलाफ आक्रोश दिखा। उनका गाना ‘बलिदान’ प्रदर्शनकारी युवाओं के लिए एक एंथम जैसा बन गया। वे अपने गीतों में बार-बार यह संदेश देते रहे कि नेता जनता का शोषण कर रहे हैं और व्यवस्था बदलने की जरूरत है। यही भाषा उन्हें युवाओं के करीब ले गई। राजनीति में आने के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि अब वे उसी व्यवस्था को भीतर से सुधारने की कोशिश कर रहे हैं जिसकी कभी सख्त आलोचना करते थे। एक रैपर से नेता तक का यह बदलाव उन्हें एक ऐसा चेहरा बनाता है जो युवाओं की सोच और आवाज को सीधे जोड़ता है।
विवादों और आलोचनाओं के बीच डटे रही बालेन
जहां बालेन की लोकप्रियता बढ़ी, वहीं आलोचना और विवाद भी उनके साथ जुड़े। रेहड़ी-पटरी वालों के खिलाफ की गई सख्त कार्रवाई को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने सवाल उठाए। 2023 में ‘आदिपुरुष’ फिल्म पर विवादित संवाद को लेकर उन्होंने भारतीय फिल्मों पर अस्थायी रोक भी लगा दी, जिसे बाद में न्यायालय ने हटाया। इन घटनाओं से यह साफ है कि बालेन शाह सिर्फ प्रशंसा ही नहीं, बल्कि आलोचना का भी सामना करते हैं। बावजूद इसके, उनकी लोकप्रियता में कमी नहीं आई है। आज वे सिर्फ काठमांडू तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे नेपाल में युवाओं की उम्मीदों और बदलाव की भूख का प्रतीक बन चुके हैं।
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