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‘हॉट सीट’ राघोपुर जहां से तय होता है पूरे बिहार की राजनीति का मिजाज…ढह जाएगा लालू परिवार का किला या बचेगी तेजस्वी की सियासी साख..!

भारत बिहार
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बिहार विधानसभा की राजनीति में कुछ सीटें महज चुनाव क्षेत्र नहीं होतीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों का केंद्र होती हैं। वैशाली जिले की राघोपुर विधानसभा सीट इन्हीं VVIP सीटों में से एक है, जिसे न केवल लालू परिवार का ‘पारंपरिक गढ़’ माना जाता है, बल्कि इसने बिहार को 2 मुख्यमंत्री (लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी) और एक उप-मुख्यमंत्री (तेजस्वी यादव) भी दिए हैं।

इस बार भी राघोपुर सुर्खियों में है, जहां वर्तमान विधायक और RJD के राजनीतिक वारिस तेजस्वी यादव की साख दांव पर है। इस सीट की हर चुनावी हलचल, पूरे बिहार की राजनीति का मिजाज तय करती है।

‘लालू’ की एंट्री से बनी VVIP सीट

राघोपुर विधानसभा क्षेत्र का गठन 1951 में हुआ था, लेकिन सही मायनों में यह सीट तब ‘हॉट’ बनी, जब 1995 में RJD सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने यहां से चुनाव लड़ने का फैसला किया। उन्होंने सोनपुर सीट छोड़कर राघोपुर को अपना सियासी ठिकाना बनाया।

लालू परिवार का वर्चस्व

1995 में लालू प्रसाद यादव की जीत के बाद से यह सीट अधिकतर समय लालू परिवार के पास ही रही है। लालू प्रसाद यादव ने 1995 और 2000 में जीत दर्ज की।

राबड़ी देवी का प्रतिनिधित्व

उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने भी इस सीट का प्रतिनिधित्व किया और मुख्यमंत्री रहीं।

JDU का झटका

इस किले में एकमात्र बड़ा सेंध 2010 के चुनाव में लगा, जब JDU के सतीश कुमार यादव ने राबड़ी देवी को पराजित कर दिया था।

तेजस्वी की वापसी

2015 में, तेजस्वी यादव ने यह सीट सतीश कुमार यादव से वापस छीन ली और 2020 में भी बड़ी जीत दर्ज की। 2020 के चुनाव में उन्होंने BJP के सतीश कुमार यादव को 38,174 वोटों के बड़े अंतर से हराया था।

जातीय समीकरण

‘यादव’ फैक्टर और यदुवंशियों का किला
राघोपुर की राजनीति को समझने के लिए इसके जातीय समीकरण को समझना सबसे ज़रूरी है।

यादव बहुल क्षेत्र(निर्णायक भूमिका)

यह सीट दशकों से यादव बहुल मानी जाती है और लालू परिवार का मजबूत किला होने के पीछे यही सबसे बड़ा कारण है। विभिन्न आंकड़ों के अनुसार, यहां 30 से 35 प्रतिशत तक यादव समुदाय के मतदाता हैं, जो चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। पिछले 53 वर्षों से यदुवंशी ही इस सीट से विधायक बन रहे हैं, चाहे लहर किसी भी पार्टी की रही हो।

अन्य (भूमिहार (राजपूत) और पासवान) निर्णायक समुदाय

यादवों के अलावा, यहां भूमिहार (राजपूत) और पासवान मतदाताओं की संख्या भी ठीक-ठाक है। माना जाता है कि भूमिहार वोट, बीजेपी के कोर वोट बैंक के रूप में, अक्सर लालू परिवार को कड़ी चुनौती देते रहे हैं। इसके अलावा, अनुसूचित जाति के मतदाता भी लगभग 18% हैं, जबकि मुस्लिम मतदाता करीब 3% हैं।

राजनीतिक तनातनी

तेजस्वी बनाम नए चैलेंजर
राघोपुर एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है क्योंकि तेजस्वी यादव को इस बार कड़ी चुनौती मिलने की संभावना है।

चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड

2015 और 2020 में तेजस्वी यादव ने लगातार यह सीट जीती है। हालांकि, विरोधी दल उनके द्वारा किए गए विकास कार्यों पर सवाल उठाते हुए उन्हें घेरने की कोशिश कर रहे हैं।

प्रशांत किशोर निभा सकते हैं ‘वोट कटवा’ की भूमिका

हाल ही में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने इस सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जताकर मुकाबले को और भी ‘हॉट’ बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर, खासकर राजपूत और अन्य गैर-यादव वोटों के दम पर, तेजस्वी के लिए ‘वोट कटवा’ की भूमिका निभा सकते हैं।

NDA की रणनीति

NDA (बीजेपी-जेडीयू) के लिए 2010 के इतिहास को दोहराना सबसे बड़ी चुनौती है, जब उन्होंने राबड़ी देवी को हराया था। तेजस्वी के सामने किसी मजबूत गैर-यादव उम्मीदवार को उतारकर ‘जातिगत ध्रुवीकरण’ करना उनकी मुख्य रणनीति हो सकती है।

राघोपुर का रण सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं, बल्कि लालू परिवार की राजनीतिक विरासत और बिहार के भावी मुख्यमंत्री के चेहरे की साख का सवाल है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या तेजस्वी यादव इस ‘यादव गढ़’ को बचाकर अपनी ताकत बरकरार रखते हैं, या फिर कोई नया समीकरण इस हॉट सीट पर उलटफेर कर देता है।

Keywords: Raghopur Assembly Seat, Lalu Prasad Yadav, Rabri Devi, Political Dynasty

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